sherKuch Alfaaz

फूल सा बदन तेरा इस क़दर मोअत्तर है ख़्वाब में भी छू लूँ तो उँगलियाँ महकती हैं

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फफोले पड़ चुके आँखों में ज़ौक़-ए-दीद बाक़ी है  बहुत है दूर तू मुझ सेे मगर उम्मीद बाक़ी है  मेरी जाँ लौट के आजा दिल-ए-बीमार की ख़ातिर सभी की हो गई है ईद मेरी ईद बाक़ी है

SALIM RAZA REWA

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शादाब जिन की ख़ुशबू से हर इक गुलाब है रौशन चमक से जिन की 'रज़ा' आफ़ताब है सूरत वो जिस पे नाज़ है कुल काएनात को वो सूरत-ए-रसूल ख़ुदा की किताब है

SALIM RAZA REWA

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बन के मेहमान उस की ग़ुर्बत का लज़्ज़त-ए ग़म को चख के आया हूँ क़ैद करने को हर अदा उस की आँखें चौखट पे रख के आया हूँ

SALIM RAZA REWA

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उम्र भर मुश्किलें सहता है वो बच्चों के लिए अपनी सब ख़्वाहिशें मिट्टी में दबा देता है हर ख़ुशी छोड़ के परदेस में अपनों के लिए क़तरा क़तरा वो पसीने का बहा देता है

SALIM RAZA REWA

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ताल में पंछी पनघट गागर चौपालें कितना सुंदर गाँव का मंज़र होता है टूटा फूटा गिरा पड़ा कुछ तंग सही अपना घर तो अपना ही घर होता है

SALIM RAZA REWA

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