रह जाएगा ये दीद-ए-असद ख़्वाब ही ‘सफ़र’ ‘ग़ालिब’ के दौर में जो न जन्में तो अब मरो
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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा
Tehzeeb Hafi
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
Ahmad Faraz
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जौन' उठता है यूँँ कहो या'नी 'मीर'-ओ-'ग़ालिब' का यार उठता है
Jaun Elia
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मैं चाहता हूँ मोहब्बत मेरा वो हाल करे कि ख़्वाब में भी दोबारा कभी मजाल न हो
Jawwad Sheikh
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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उड़ानें ऊंँची भरते हैं वो जिन के पर नहीं होते जो अक्सर घर बनाते हैं उन्हीं के घर नहीं होते
SHIV SAFAR
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ये दुनिया जो अपनों को भी याद नहीं अब करती है मुझ को याद रखेगी इस उम्मीद पे ही दम तोड़ा हूँ
SHIV SAFAR
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मुझे बेवजह सा है लग रहा जो गुलों पे छाया शबाब है जो न तेरे बालों में लग सका वो गुलाब क्या ही गुलाब है
SHIV SAFAR
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मेरी साँसें ये नहीं अब जैसे कोई आह हुई तेरी याद आई मेरी ज़िंदगी तबाह हुई
SHIV SAFAR
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साथ इक दूजे के हम होते जनाब पास फिर इतने न ग़म होते जनाब मुझ सेे ही होती समुंदर में नमी दुख जो रो लेने से कम होते जनाब
SHIV SAFAR
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