सर पे दुनिया के रख कर अपना दुखड़ा क्या रोना दुनिया, दुनिया ही तो है किस किस का ग़म पालेगी
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है
Shakeel Azmi
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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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मुद्दतें गुज़र गई 'हिसाब' नहीं किया न जाने अब किस के कितने रह गए हम
Kumar Vishwas
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मेरी नज़रे उठी उठी, तेरी नज़रें झूकी झुकी तोल रहे हैं प्यार को जैसे दो पैमानों में
Ali Mohammed Shaikh
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सामने वो नज़र के रहे इस लिए उस की बस्ती में ही काम पर लग गए वो तो आया नहीं हाथ मेरे मगर हाथ इस के बहाने हुनर लग गए
Ali Mohammed Shaikh
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तेरी नज़र से कोई रोज़ जख्मी होता है ख़याल रखना किसी दिन वो मारा न जाएँ
Ali Mohammed Shaikh
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होता है दर्द क़ल्ब के नज़दीक सुना था तुम से मिले तो पुख़्ता हुआ ठीक सुना था
Ali Mohammed Shaikh
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ऐसे शगुफ़्ता रंग गुज़िश्ता कभी न था मैं फूल था मगर तेरे दर का कभी न था इतना तेरे दयार से मुझ को अता हुआ इतना नसीब ने मेरे सोचा कभी न था
Ali Mohammed Shaikh
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