शह्र-ए-दिल के सर्द मौसम और सादा-रूह हम सारी माचिस फूँक बैठे इक ज़रा सी आग को
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तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे
Qaisar-ul-Jafri
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इश्क़ से अपने कुछ चुने लम्हें अनकहे और अनसुने लम्हें आओ मिल कर जियें दुबारा से सर्द रातों के गुनगुने लम्हें
Sandeep Thakur
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अब उदास फिरते हो सर्दियों की शामों में इस तरह तो होता है इस तरह के कामों में
Shoaib Bin Aziz
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सारी रात लगाकर उसपर नज़्म लिखी और उस ने बस अच्छा लिखकर भेजा है
Zahid Bashir
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना था वो ख़्वाब में भी मिले मैं नींद नींद को तरसा मगर नहीं सोया ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल था कि थम गई बारिश ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म है कि मैं नहीं रोया
Khalil Ur Rehman Qamar
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वक़्त के साथ हुए साथ जो दिन रहने के फिर किसी साल महीने में नहीं आएँगे
pankaj pundir
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तुम को सब अपने प्रेम करते हैं कैसे समझोगे तुम शिवा का दर्द
pankaj pundir
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तुम पे लाज़िम था सफ़र आसान करना इश्क़ का बा'द लुटने के लुटेरा तो नहीं बन जाना था
pankaj pundir
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यार कोई तो उस को समझाओ प्यार की नाव पर अना का बोझ
pankaj pundir
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तन्हा रहना और ख़ुश रहना, सज़ा काफ़ी नहीं तय हुआ वक़तन-फ़वक़तन सामने भी आना है
pankaj pundir
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