शक्लें बुझी बुझी सी लगने लगी मिले तो शायद कभी कभी मिलते हैं इसीलिए तो
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हर शे'र हर ग़ज़ल पे है ऐसी छाप तेरी तस्वीर बन रही है इक अपने आप तेरी तेरे लिए किसी को इतना दीवाना देखा लगने लगी है मुझ को चाहत भी पाप तेरी
Sandeep Thakur
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उलझ कर के तेरी ज़ुल्फ़ों में यूँँ आबाद हो जाऊँ कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊँ मैं यमुना की तरह तन्हा निहारूँ ताज को कब तक कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊँ
Ashraf Jahangeer
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अश्कों से बुझाकर आया हूँ जो आग लगी है झरने में
nakul kumar
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न जाने क्यूँँ गले से लगने की हिम्मत नहीं होती न जाने क्यूँँ पिता के सामने बेटे नहीं खुलते
Kushal Dauneria
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दुख तो बहुत मिले हैं मोहब्बत नहीं मिली या'नी कि जिस्म मिल गया औरत नहीं मिली मुझ को पिता की आँख के आँसू तो मिल गए मुझ को पिता से ज़ब्त की आदत नहीं मिली
Abhishar Geeta Shukla
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उसे तर्क-ए-मोहब्बत से नहीं कोई परेशानी इसी इक बात ने दिल में परेशानी बढ़ाई है
Amanpreet singh
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उसे मुझ सेे शिकायत एक ये भी थी मुझे उस सेे मोहब्बत ही हुई थी क्यूँ
Amanpreet singh
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तुम्हें ये सब समझने में अभी थोड़ा समय तो है किसी ने ज़िंदगी कैसे दुखी हो कर निकाली थी
Amanpreet singh
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वो पहाड़ों से यूँँ नीचे देखता है जैसे अब भी बाबा नीचे बैठे होंगे
Amanpreet singh
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तुम्हें आती समझ तो ये नहीं होता अभी तो बस जवाबों में दुआ लो तुम
Amanpreet singh
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