सिरहाने 'मीर' के कोई न बोलो अभी टुक रोते रोते सो गया है
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या
Jaun Elia
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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न रक्खो कान नज़्म-ए-शाइ'रान-ए-हाल पर इतने चलो टुक 'मीर' को सुनने कि मोती से पिरोता है
Meer Taqi Meer
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मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
Meer Taqi Meer
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फूल गुल शम्स-ओ-क़मर सारे ही थे पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत
Meer Taqi Meer
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उम्र गुज़री दवाएँ करते 'मीर' दर्द-ए-दिल का हुआ न चारा हनूज़
Meer Taqi Meer
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ओहदे से निकलें किस तरह आशिक़ एक अदा उस की है हज़ार-फ़रेब
Meer Taqi Meer
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