सोलह बरस की मेरी वो महबूब माँ के सामने हँसकर शिकायत कर रही है ख़ूब माँ के सामने
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मेरे आँसू नहीं थम रहे कि वो मुझ सेे जुदा हो गया और तुम कह रहे हो कि छोड़ो अब ऐसा भी क्या हो गया मय-कदों में मेरी लाइनें पढ़ते फिरते हैं लोग मैं ने जो कुछ भी पी कर कहा फ़लसफ़ा हो गया
Tehzeeb Hafi
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए तुम मेरी जान किस गुमान में हो
Jaun Elia
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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सौंप के देखी हम ने अंग्रेजों को दुनिया अब तो ये कुर्सी हिंदुस्तानी बनती है
Vibhu Raj
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रौनक़ इतनी कर रहे हो घर में क्यूँ क्या तुम आए भी जो जाने के लिए
Vibhu Raj
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क़रीबियों से तो गिला मुझे भी है मैं काश बोल पाता आप से भी है अफ़ीम वालों का मैं दुख समझता हूँ कि एक चाय की तो लत मुझे भी है
Vibhu Raj
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जान लो तुम उन की भी मजबूरियाँ देख लो इक रोज़ रह कर पर्दों में
Vibhu Raj
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पिछड़ गया हूँ पता चला ये पिछड़ने के बा'द बिगाड़ लेगा कोई मेरा क्या बिगड़ने के बा'द बताओ अब मानते हो पिंजरे में रह रहे थे सूकून कितना मिला है तुम को बिछड़ने के बा'द
Vibhu Raj
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