सोलह दिन पहले तक जो बस मेरी थी सोलह दिन के बा'द वही 'तौबा-तौबा'
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मैं जब मर जाऊँ तो मेरी अलग पहचान लिख देना लहू से मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना
Rahat Indori
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तरीक़े और भी हैं इस तरह परखा नहीं जाता चराग़ों को हवा के सामने रक्खा नहीं जाता मोहब्बत फ़ैसला करती है पहले चंद लम्हों में जहाँ पर इश्क़ होता है वहाँ सोचा नहीं जाता
Abrar Kashif
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मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो
Himanshi babra KATIB
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तुम मोहब्बत को खेल कहते हो हम ने बर्बाद ज़िंदगी कर ली
Bashir Badr
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दिन ढल गया और रात गुज़रने की आस में सूरज नदी में डूब गया, हम गिलास में
Rahat Indori
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तेरी क़ुर्बत में उम्रभर रह कर मेरी अंतिम तलब मुहब्बत थी
Upendra Bajpai
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तुम ने मेरी पेशानी पर होंठों से जो लिक्खा है सच बतलाऊँ ये दुनिया का सब सेे उम्दा मतला है
Upendra Bajpai
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ख़ुदा जाने कहाँ पे खो गया वो मेरे अपनों को मेरे साथ कर के अभी लौटा हूँ अपने बिस्तरा पर तेरी यादों से दो-दो हाथ कर के
Upendra Bajpai
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उस ने पूछा याद हमारी आती है कोई अपनी बर्बादी को भूलता है
Upendra Bajpai
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तुम तो बेताब थे जगाने को पर मुझे नींद ही नहीं आई
Upendra Bajpai
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