ख़ुदा जाने कहाँ पे खो गया वो मेरे अपनों को मेरे साथ कर के अभी लौटा हूँ अपने बिस्तरा पर तेरी यादों से दो-दो हाथ कर के
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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हुआ ही क्या जो वो हमें मिला नहीं बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं
Azhar Iqbal
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मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे तू देख कि क्या रंग है तेरा, मेरे आगे
Mirza Ghalib
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मुद्दतों बा'द इक शख़्स से मिलने के लिए आइना देखा गया, बाल सँवारे गए
Jaun Elia
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सोलह दिन पहले तक जो बस मेरी थी सोलह दिन के बा'द वही 'तौबा-तौबा'
Upendra Bajpai
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तुम तो बेताब थे जगाने को पर मुझे नींद ही नहीं आई
Upendra Bajpai
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कितनी परियों की नसीहत ले कर ऐसी आँखें बनाई जाती हैं
Upendra Bajpai
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उस ने पूछा याद हमारी आती है कोई अपनी बर्बादी को भूलता है
Upendra Bajpai
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इक मैसेज़ लिखकर दोनों को भेज दिया इक चाबी से दो तालों को खोला है
Upendra Bajpai
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