तब मुझे दर्द का एहसास बहुत होता है जब मेरी लख़्त-ए-जिगर आँख भिगो लेती है
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
Jaun Elia
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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शादाब जिन की ख़ुशबू से हर इक गुलाब है रौशन चमक से जिन की 'रज़ा' आफ़ताब है सूरत वो जिस पे नाज़ है कुल काएनात को वो सूरत-ए-रसूल ख़ुदा की किताब है
SALIM RAZA REWA
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ताल में पंछी पनघट गागर चौपालें कितना सुंदर गाँव का मंज़र होता है टूटा फूटा गिरा पड़ा कुछ तंग सही अपना घर तो अपना ही घर होता है
SALIM RAZA REWA
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ये वज़ीफ़ा मेरा सुब्ह-ओ-शाम है मेरे लब पर सिर्फ़ तेरा नाम है मेरा घर ख़ुशियों से है फूला फला मेरे रब का ये बड़ा इन'आम है
SALIM RAZA REWA
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बन के मेहमान उस की ग़ुर्बत का लज़्ज़त-ए ग़म को चख के आया हूँ क़ैद करने को हर अदा उस की आँखें चौखट पे रख के आया हूँ
SALIM RAZA REWA
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टूटा-फूटा गिरा पड़ा कुछ तंग सही अपना घर तो अपना ही घर होता है ताल में पंछी पनघट गागर चौपालें कितना सुंदर गाँव का मंज़र होता है
SALIM RAZA REWA
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