तल्ख़ी है क्यूँँ ये कैसी मनमानी है क्यूँँ रूठे हो मुझ सेे क्या ही ठानी है
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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बात करो रूठे यारों से सन्नाटों से डर जाते हैं प्यार अकेला जी लेता है दोस्त अकेले मर जाते हैं
Kumar Vishwas
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तुम उन के वा'दे का ज़िक्र उन से क्यूँँ करो 'ग़ालिब' ये क्या कि तुम कहो और वो कहें कि याद नहीं
Mirza Ghalib
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अब उस की शादी का क़िस्सा न छेड़ो बस इतना कह दो कैसी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल हार जाने का हौसला है मुझे
Ahmad Faraz
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ज़ुल्फ़ों में सजा मुझे लो अपनी तुम बना के गुल बन सदा-बहार मैं खिला रहूँगा साए में
Abha sethi
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ज़रूरत नहीं इत्र की अब हमें ख़यालो से तेरे महक हम गए
Abha sethi
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ये इश्क़ ज़िंदा रखने को हैं टूट जाते गुल कई
Abha sethi
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मा'सूमियत चलती नहीं हर इक जगह ही बंदे सुन जब हो मुक़ाबिल ज़िंदगी बनना खिलाड़ी पड़ता है
Abha sethi
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मसरूफ़ियत में ख़्वाब बन आए है वो महबूब तो चंचल बड़ा ही है मिरा
Abha sethi
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