उन पे कुछ शे'र जब कहे मैं ने मेरी ग़ज़लों में जान तब आई
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बंसी सब सुर त्यागे है, एक ही सुर में बाजे है हाल न पूछो मोहन का, सब कुछ राधे राधे है
Zubair Ali Tabish
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
Allama Iqbal
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ज़िंदा रखने को ख़्वाहिशें उन की दफ़्न सब अपनी हसरतें कर दीं
Wasif Quazi
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सदियाँ हिज्र की देखी हैं आँखों ने इस सेे हसीं सजा अब और क्या होगी
Wasif Quazi
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जिस दिन से उस ने तोड़े मरासिम हैं मेरे साथ तब से मिरे वजूद पे उठती हैं उँगलियाँ
Wasif Quazi
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वो समझते हैं जिस को दिल मेरा उन की यादों की क़ब्रगाह है वो
Wasif Quazi
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जब पुकारा है मैं ने माँ कह कर फूल खिलने लगे बयाबाँ में
Wasif Quazi
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