उस की चाहत में भी इख़लास नहीं था शायद और कुछ हम भी उसे दिल से नहीं चाह सके
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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बंसी सब सुर त्यागे है, एक ही सुर में बाजे है हाल न पूछो मोहन का, सब कुछ राधे राधे है
Zubair Ali Tabish
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देखो हम कोई वहशी नहीं दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नहीं लगवाने हैं
Varun Anand
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आख़िर को मिरे हाल पे वो शख़्स भी रोया कहता था जो कुछ भी नहीं दर्द-ए-ग़म-ए-हिज्राँ
Salman ashhadi sahil
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याद करने की सहूलत तो मुयस्सर थी मगर भूल जाना ही उसे मैं ने ज़रूरी समझा
Salman ashhadi sahil
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फिर यूँँ हुआ कि शहर की रौनक़ को छोड़कर हम ऐसे लोग गाँव की जानिब निकल पड़े
Salman ashhadi sahil
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मैं किस से बात करूँँ किस के साथ दुख बाँटूं मिरे मिज़ाज का कोई नहीं है दुनिया में
Salman ashhadi sahil
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बहुत अफ़सोस होता है ख़ज़ाने को लुटा बैठे मोहब्बत जिस से करते हैं उसी को हम गँवा बैठे
Salman ashhadi sahil
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