बहुत अफ़सोस होता है ख़ज़ाने को लुटा बैठे मोहब्बत जिस से करते हैं उसी को हम गँवा बैठे
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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अव्वल तो मैं नाराज़ नहीं होता हूँ लेकिन हो जाऊँ तो फिर मुझ सेा बुरा होता नहीं है
Ali Zaryoun
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प्यार दो बार थोड़ी होता है हो तो फिर प्यार थोड़ी होता है यही बेहतर है तुम उसे रोको मुझ सेे इनकार थोड़ी होता है
Zubair Ali Tabish
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आख़िर को मिरे हाल पे वो शख़्स भी रोया कहता था जो कुछ भी नहीं दर्द-ए-ग़म-ए-हिज्राँ
Salman ashhadi sahil
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याद करने की सहूलत तो मुयस्सर थी मगर भूल जाना ही उसे मैं ने ज़रूरी समझा
Salman ashhadi sahil
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उस की चाहत में भी इख़लास नहीं था शायद और कुछ हम भी उसे दिल से नहीं चाह सके
Salman ashhadi sahil
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किस को फ़ुर्सत है किसी की नाज़ बरदारी करे आदमी हर एक अपने आप में मसरूफ़ है
Salman ashhadi sahil
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अब तो बस तन्हाइयाँ ही साथ रहती हैं सदा याद पड़ता है कि पहले रौनक़-ए -महफ़िल थे हम
Salman ashhadi sahil
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