उस मेहरबाँ नज़र की इनायत का शुक्रिया तोहफ़ा दिया है ईद पे हम को जुदाई का
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तुम भी वैसे थे मगर तुम को ख़ुदा रहने दिया इस तरह तुम को ज़माने से जुदा रहने दिया
Khalil Ur Rehman Qamar
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है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़ अहल-ए-नज़र समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद
Allama Iqbal
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे
Tehzeeb Hafi
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आँखें देखूँ तो नज़र चेहरे से हट जाती है ऐसी औरत है मुकम्मल नहीं देखी जाती
Fareh Shujeeh
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और कुछ तोहफ़ा न था जो लाते हम तेरे नियाज़ एक दो आँसू थे आँखों में सो भर लाएँ हैं हम
Meer Hasan
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लगता है कई रातों का जागा था मुसव्विर तस्वीर की आँखों से थकन झाँक रही है
Unknown
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टकरा गया वो मुझ से किताबें लिए हुए फिर मेरा दिल और उस की किताबें बिखर गईं
Unknown
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ये साल भी उदासियाँ दे कर चला गया तुम से मिले बग़ैर दिसम्बर चला गया
Unknown
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क्या क़यामत है कि आरिज़ उन के नीले पड़ गए हम ने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का
Unknown
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रहबर भी ये हमदम भी ये ग़म-ख़्वार हमारे उस्ताद ये क़ौमों के हैं में'मार हमारे
Unknown
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