वहशत के कारखाने से ताज़ा ग़ज़ल निकाल ऐ सब्र के दरख़्त मेरा मीठा फल निकाल
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आप की आँखें अगर शे'र सुनाने लग जाएँ हम जो ग़ज़लें लिए फिरते हैं, ठिकाने लग जाएँ
Rehman Faris
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किसी से छोटी सी एक उम्मीद बाँध लीजिए मोहब्बतों का अगर जनाज़ा निकालना है
Shakeel Jamali
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मेरे होंठों के सब्र से पूछो उस के हाथों से गाल तक का सफ़र
Mehshar Afridi
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ग़ज़ल की नाव में बैठे हुए हम तेरे ग़म से किनारा कर रहे है
Rohit Gustakh
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रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है
Rahat Indori
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नज़र से तुम को मिले न कोई सुराग़ दिल का झुका के गर्दन बुझा लिया है चराग़ दिल का सुनूँ न कैसे करूँँ न क्यूँँकर मैं अपने दिल की मेरे अलावा है कौन इस बद-दिमाग़ दिल का
Ammar Iqbal
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मैं ने तस्वीर फेंक दी है मगर कील दीवार में गड़ी हुई है
Ammar Iqbal
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कैसा मुझ को बना दिया 'अम्मार' कौन सा रंग भर गए मुझ में
Ammar Iqbal
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मैं आईनों को देखे जा रहा था अब इन से बात भी करने लगा हूँ
Ammar Iqbal
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दिल आज शाम से ही उसे ढूँडने लगा कल जिस के बा'द कमरे में तन्हाई आई थी
Ammar Iqbal
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