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वो किस को चाहती है और किस सेे प्रेम करती है मुहब्बत में कोई तुक्का कभी आसाँ नहीं होता

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तुझे देखना है क़रीब से तू जो पास आ के यूँँ बैठ जा तिरे होंठ सुर्ख़ गुलाब हैं तो गुलाब को अभी चूम लूँ

Sachin Sharma

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वो उधर फूलों की सेज पर है ज़िन्दगी आख़िरी स्टेज पर है बात जो सखियाँ करवा रही थीं उन का भी फोन इंगेज पर है

Sachin Sharma

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मुझे ढूँढती हैं तुम्हारी ये आँखें मैं जो ढूँढ़ता हूँ वो तुम में नहीं है

Sachin Sharma

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शे'र कहने के न चक्कर में पड़े कुछ नहीं होगा यूँँ बिस्तर में पड़े हो के ग़ुस्से में पिताजी ने कहा तोड़ते हो रोटियाँ घर में पड़े

Sachin Sharma

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शब्दों को जोड़ कर के मिसरा बनाता हूँ मैं ऊँचे पहाड़ों को भी तिनका बनाता हूँ मैं इंजीनियर को आता है काम ये भी करना तिरछी डगर पे सीधा रस्ता बनाता हूँ मैं

Sachin Sharma

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