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वो मुहब्बत का तलबगार नहीं हो सकता जो सितमगर है उसे प्यार नहीं हो सकता तेरे होते हुए जो चाँद का दीदार करे कुछ भी होगा वो समझदार नहीं हो सकता

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वो मुहब्बत का तलबगार नहीं हो सकता जो सितमगर है उसे प्यार नहीं हो सकता तेरे होते हुए जो चाँद का दीदार करे कुछ भी होगा वो समझदार नहीं हो सकता

Zeeshan kaavish

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वो ही मुझ को गिराने वाला है जिस को गिरते हुए सँभाला है दिल को पत्थर बनाया था मैं ने उस ने पत्थर भी तोड़ डाला है

Zeeshan kaavish

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काम मुश्किल था मगर कर जाता ज़ख़्म-ए-दिल मेरा कोई भर जाता सिगरटों ने मुझे बचाया है गर न पीता इन्हें तो मर जाता

Zeeshan kaavish

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उन की आँखों से जब से पी यारो छोड़ दी तब से मय-कशी यारो रात को छत से चाँद जब देखा याद उन की फिर आ गई यारो

Zeeshan kaavish

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बिन कहे छोड़ के न जाता तो अपनी आँखों से कुछ जताता तो कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी पर वो मजबूरियाँ बताता तो

Zeeshan kaavish

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