वो मुझे कितना याद करती है ये मेरी हिचकियाँ बताती है
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा
Fahmi Badayuni
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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मैं जब मर जाऊँ तो मेरी अलग पहचान लिख देना लहू से मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना
Rahat Indori
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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तू मेरी जुस्त जू से वाक़िफ़ है ये मेरे लिए बहुत मुनासिफ है
Aryan Goswami
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मैं तुझ सेे रोज़ छुआ जाऊँ यही चाहत थी, है, रहेगी
Aryan Goswami
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ग़ज़ल है आत्मा फिर भी नज़ाकत की ज़रूरत है बूढ़ापो के मोहल्ले में शरारत की ज़रूरत है ये दुनिया जान कर भी कुछ नहीं करती मेरे ख़ातिर मुझे उस की ज़रूरत है उसे मेरी ज़रूरत है
Aryan Goswami
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ए ज़िंदगी तेरी फ़रमाहिशे किसी दिन जान ले के छोड़ेगी
Aryan Goswami
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ये नदियाँ दूर तक जाए किनारे कम नहीं होते भला किस के दिलो में तुम कहो की ग़म नहीं होते यूँँ ही हर बात पर रुशवा अगर होने लगोगे तो कहो कैसे संभाले दिल भला क्यूँ हम नहीं रोते
Aryan Goswami
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