वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया दरख़्त काट के जब थक गया लकड़हारा तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया
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तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो तो फिर ये बताओ कि तुम उस की आँखों के बारे में क्या जानते हो ये जुग़राफ़िया फ़ल्सफ़ा साईकॉलोजी साइंस रियाज़ी वग़ैरा ये सब जानना भी अहम है मगर उस के घर का पता जानते हो
Tehzeeb Hafi
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परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है
Shakeel Azmi
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अगर है इश्क़ सच्चा तो निगाहों से बयाँ होगा ज़बाँ से बोलना भी क्या कोई इज़हार होता है
Bhaskar Shukla
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मैं भी इक शख़्स पे इक शर्त लगा बैठा था तुम भी इक रोज़ इसी खेल में हारोगे मुझे ईद के दिन की तरह तुम ने मुझे ज़ाया' किया मैं समझता था मुहब्बत से गुज़ारोगे मुझे
Ali Zaryoun
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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
Nida Fazli
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ऊँचे नीचे घर थे बस्ती में बहुत ज़लज़ले ने सब बराबर कर दिए
Zubair Ali Tabish
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जहाँ तक आके तुम वापस गए हो वहाँ अब तक कोई पहुँचा नहीं है
Zubair Ali Tabish
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चूड़ियाँ बेच के वो मेरे लिए लाई 'गिटार' तार छेड़ूँ तो खनकने की सदा आती है
Zubair Ali Tabish
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अब तलक उस को ध्यान हो मेरा क्या पता ये गुमान हो मेरा
Zubair Ali Tabish
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मैं कहाँ जाऊँ करूँँ किस से शिकायत उस की हर तरफ़ उस के तरफ़-दार नज़र आते हैं।
Zubair Ali Tabish
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