ये तो बढ़ती ही चली जाती है मीआद-ए-सितम ज़ुज़ हरीफ़ान-ए-सितम किस को पुकारा जाए वक़्त ने एक ही नुक्ता तो किया है ता'लीम हाकिम-ए-वक़त को मसनद से उतारा जाए
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तुम्हें इक मश्वरा दूँ सादगी से कह दो दिल की बात बहुत तैयारियाँ करने में गाड़ी छूट जाती है
Zubair Ali Tabish
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हम से यहाँ तो कुछ भी समेटा न जा सका हम से हर एक चीज़ बिखरती चली गई
Ameer Imam
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पास हमारे आ कर वो शर्माती है तब जा कर के एक ग़ज़ल हो पाती है उस को छूना छोटा मोटा खेल नहीं गर्मी क्या सर्दी में लू लग जाती है
Tanoj Dadhich
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रिश्तों की ये नाज़ुक डोरें तोड़ी थोड़ी जाती हैं, अपनी आँखें दुखती हों तो फोड़ी थोड़ी जाती हैं ये काँटे, ये धूप, ये पत्थर इनसे कैसा डरना है राहें मुश्किल हो जाएँ तो छोड़ी थोड़ी जाती हैं
Subhan Asad
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सफ़र में मुश्किलें आएँ तो जुरअत और बढ़ती है कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है
Nawaz Deobandi
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ख़ूब है इश्क़ का ये पहलू भी मैं भी बर्बाद हो गया तू भी
Jaun Elia
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बस यूँँ ही मेरा गाल रखने दे मेरी जान आज गाल पर अपने
Jaun Elia
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रह-गुज़र-ए-ख़याल में दोश-ब-दोश थे जो लोग वक़्त की गर्द-बाद में जाने कहाँ बिखर गए
Jaun Elia
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अब जो रिश्तों में बँधा हूँ तो खुला है मुझ पर कब परिंद उड़ नहीं पाते हैं परों के होते
Jaun Elia
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ख़र्च चलेगा अब मेरा किस के हिसाब में भला सब के लिए बहुत हूँ मैं अपने लिए ज़रा नहीं
Jaun Elia
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