रिश्तों की ये नाज़ुक डोरें तोड़ी थोड़ी जाती हैं, अपनी आँखें दुखती हों तो फोड़ी थोड़ी जाती हैं ये काँटे, ये धूप, ये पत्थर इनसे कैसा डरना है राहें मुश्किल हो जाएँ तो छोड़ी थोड़ी जाती हैं
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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मेरे नाम से क्या मतलब है तुम्हें मिट जाएगा या रह जाता है जब तुम ने ही साथ नहीं रहना फिर पीछे क्या रह जाता है मेरे पास आने तक और किसी की याद उसे खा जाती है वो मुझ तक कम ही पहुँचता है किसी और जगह रह जाता है
Tehzeeb Hafi
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सख़्ती थोड़ी लाज़िम है पर पत्थर होना ठीक नहीं हिन्दू मुस्लिम ठीक है साहब कट्टर होना ठीक नहीं
Salman Zafar
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ये मोहब्बत है ये मर जाने से भी जाती नहीं तू कोई क़ैदी नहीं है जो रिहा हो जाएगा
Ali Zaryoun
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कोई तो पूछे मोहब्बत के इन फ़रिश्तों से वफ़ा का शौक़ ये बिस्तर पे क्यूँ उतर आया
Harsh saxena
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तू ने सोचा भी है जानाँ कि तेरे वादे ने कितनी सदियों से नहीं पहना अमल का पैकर
Subhan Asad
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ये मेरी ज़िद ही ग़लत थी कि तुझ सेा बन जाऊँ मैं अब न अपनी तरह हूँ न तेरे जैसा हूँ हमारे बीच ज़माने की बद-गुमानी है मैं ज़िंदगी से ज़रा कम ही बात करता हूँ
Subhan Asad
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जब बुलंदी का गुमाँ था तो नहीं याद आई अपनी परवाज़ से टूटे तो ज़मीं याद आई वही आँखें कि जो ईमान-शिकन आँखें हैं उन्हीं आँखों की हमें दावत-ए-दीं याद आई
Subhan Asad
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'असद' ये शर्त नहीं है कोई मुहब्बत में कि जिस सेे प्यार करो उस की आरज़ू भी करो
Subhan Asad
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मुझे भी बख़्श दे लहजे की ख़ुश-बयानी सब तेरे असर में हैं अल्फ़ाज़ सब, मआ'नी सब मेरे बदन को खिलाती है फूल की मानिंद कि उस निगाह में है धूप, छाँव, पानी सब
Subhan Asad
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