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यूँँ देगा तवज्जोह कोई तो यहाँ पर कभी ये ज़माना भी समझेगा हम को

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ज़मीं पे आसमाँ पिघला हुआ ही पाओगे समय यूँँ हाथों से निकला हुआ ही पाओगे किसी के वास्ते ख़ुद को सँवार कर देखो तुम अपने आप को बदला हुआ ही पाओगे

Naviii dar b dar

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उस के चेहरे से नज़र अब भला कैसे हटे उस में दिखती है झलक मुझ को मेरे यार की

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रिश्ते में बस्तगी लिख रहा हूँ फिर वही ज़िन्दगी लिख रहा हूँ उन हसीं रातों को दफ़्न कर के अब कहाँ दिल-लगी लिख रहा हूँ

Naviii dar b dar

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मुहब्बत ने सब को किनारा दिया है किसी शख़्स का यूँँ सहारा दिया है जिसे मानता है ये सारा ज़माना मुक़द्दस ये रिश्ता भी प्यारा दिया है

Naviii dar b dar

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वो अलग किरदार में दिखता है अब आदमी क्यूँ हार में दिखता है अब देख कर दुख होता है दिल को मेरे झूठ जब अख़बार में दिखता है अब

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