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ज़िंदगी तो दर-ब-दर खिलवा रही थी ठोकरें मौत ने लो मंज़िल-ए-मकसूद पर पहुँचा दिया

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ये क्यूँ ज़रदार सारे देख कर करते नहीं हैं ग़म किसी के चश्म क्यूँ ये देख कर होते नहीं हैं नम ज़माना हो गया हम को जवानी ढलने वाली है लिबास-ए-मुफ़्लिसी बचपन से ओढ़े फिर रहे हैं हम

Shajar Abbas

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वो मेरी चूम के पेशानी मुझ सेे कहने लगी 'शजर' तुम्हारा मेरा साथ बस यहीं तक था

Shajar Abbas

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ज़ुल्म मज़लूमों पे ढाना छोड़ दो हक़ यतीमों का दबाना छोड़ दो ये नहीं कर सकते तो बेहतर है ये सर को सज्दे में झुकाना छोड़ दो

Shajar Abbas

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याद है माज़ी का हर लम्हा मुझे अच्छे से मैं ने जब पहली दफ़ा माँ की दुआएँ ली थीं उस ने होंठों से मिरा चूमा था माथा बढ़कर उस ने हाथों से शजर मेरी बलाएँ ली थीं

Shajar Abbas

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ज़ुल्म की मिल के क़मर ऐसे करेंगे ख़म सब दूर हो जाएँगे ये अपने वतन से ग़म सब ख़्वाब अज्दाद ने जो देखा है इक दिन उस की देखना ख़ून से ता'बीर लिखेंगे हम सब

Shajar Abbas

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