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Shayari of Bekhud Dehlvi

Shayari of Bekhud Dehlvi ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.

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Series se pehle kuch standout sher padhein.

दिल मोहब्बत से भर गया 'बेख़ुद' अब किसी पर फ़िदा नहीं होता

अदाएँ देखने बैठे हो क्या आईने में अपनी दिया है जिस ने तुम जैसे को दिल उस का जिगर देखो

बात वो कहिए कि जिस बात के सौ पहलू हों कोई पहलू तो रहे बात बदलने के लिए

शे’र में जिस बिंदु का वर्णन किया गया है उसी ने इसे दिलचस्प बनाया है। इसमें शब्द बात की यद्यपि तीन बार और पहलू की दो बार पुनरावृत्ति हुई है मगर शब्दों की तुकबंदी और अभिव्यक्ति के प्रवाह की विशेषता ने शे’र में आनंद पैदा किया है। पहलू के अनुरूप शब्द बदलने से शे’र की स्थिति का आभास होता है। दरअसल शे’र में जिस बिंदु का वर्णन किया गया है, हालांकि इसकी कोई विशेषता नहीं बल्कि सामान्य है मगर जिस अंदाज़ से शायर ने इस बिंदु को व्यक्त किया है वो सरल होने के बावजूद इस बिंदु को दुर्लभ बना देता है। शे’र का अर्थ यह है कि बात को कुछ ऐसे प्रतीकात्मक ढंग से कहना चाहिए कि इससे सौ तरह के विभिन्न अर्थ निकलते हों। क्योंकि अर्थ की दृष्टि से एकहरी बात कहना बुद्धिमान लोगों की शैली नहीं बल्कि वे एक बात में सौ बिंदुओं का सार व्यक्त करते हैं। इस तरह से सुनने वालों को बहस करने या स्पष्टीकरण मांगने के लिए कोई न कोई पहलू हाथ आजाता है। और जब बात के पहलू प्रचुर हों तो बात बदलने में आसानी होजाती है। अर्थात बिंदु से बिंदु बरामद होता है। शफ़क़ सुपुरी

सुन के सारी दास्तान-ए-रंज-ओ-ग़म कह दिया उस ने कि फिर हम क्या करें

राह में बैठा हूँ मैं तुम संग-ए-रह समझो मुझे आदमी बन जाऊँगा कुछ ठोकरें खाने के बाद

मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंद दोनों हैं ख़ुद-ग़रज़ मुझे दोनों हैं ना-पसंद

हमें पीने से मतलब है जगह की क़ैद क्या 'बेख़ुद' उसी का नाम जन्नत रख दिया बोतल जहाँ रख दी

वो कुछ मुस्कुराना वो कुछ झेंप जाना जवानी अदाएँ सिखाती हैं क्या क्या

चश्म-ए-बद-दूर वो भोले भी हैं नादाँ भी हैं ज़ुल्म भी मुझ पे कभी सोच-समझ कर न हुआ

हूरों से न होगी ये मुदारात किसी की याद आएगी जन्नत में मुलाक़ात किसी की

मुँह में वाइज़ के भी भर आता है पानी अक्सर जब कभी तज़्किरा-ए-जाम-ए-शराब आता है

तुम को आशुफ़्ता-मिज़ाजों की ख़बर से क्या काम तुम सँवारा करो बैठे हुए गेसू अपने

झूटा जो कहा मैं ने तो शर्मा के वो बोले अल्लाह बिगाड़े न बनी बात किसी की

चलने की नहीं आज कोई घात किसी की सुनने के नहीं वस्ल में हम बात किसी की

दिल मोहब्बत से भर गया 'बेख़ुद' अब किसी पर फ़िदा नहीं होता

अदाएँ देखने बैठे हो क्या आईने में अपनी दिया है जिस ने तुम जैसे को दिल उस का जिगर देखो

बात वो कहिए कि जिस बात के सौ पहलू हों कोई पहलू तो रहे बात बदलने के लिए

शे’र में जिस बिंदु का वर्णन किया गया है उसी ने इसे दिलचस्प बनाया है। इसमें शब्द बात की यद्यपि तीन बार और पहलू की दो बार पुनरावृत्ति हुई है मगर शब्दों की तुकबंदी और अभिव्यक्ति के प्रवाह की विशेषता ने शे’र में आनंद पैदा किया है। पहलू के अनुरूप शब्द बदलने से शे’र की स्थिति का आभास होता है। दरअसल शे’र में जिस बिंदु का वर्णन किया गया है, हालांकि इसकी कोई विशेषता नहीं बल्कि सामान्य है मगर जिस अंदाज़ से शायर ने इस बिंदु को व्यक्त किया है वो सरल होने के बावजूद इस बिंदु को दुर्लभ बना देता है। शे’र का अर्थ यह है कि बात को कुछ ऐसे प्रतीकात्मक ढंग से कहना चाहिए कि इससे सौ तरह के विभिन्न अर्थ निकलते हों। क्योंकि अर्थ की दृष्टि से एकहरी बात कहना बुद्धिमान लोगों की शैली नहीं बल्कि वे एक बात में सौ बिंदुओं का सार व्यक्त करते हैं। इस तरह से सुनने वालों को बहस करने या स्पष्टीकरण मांगने के लिए कोई न कोई पहलू हाथ आजाता है। और जब बात के पहलू प्रचुर हों तो बात बदलने में आसानी होजाती है। अर्थात बिंदु से बिंदु बरामद होता है। शफ़क़ सुपुरी

सुन के सारी दास्तान-ए-रंज-ओ-ग़म कह दिया उस ने कि फिर हम क्या करें

राह में बैठा हूँ मैं तुम संग-ए-रह समझो मुझे आदमी बन जाऊँगा कुछ ठोकरें खाने के बाद

मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंद दोनों हैं ख़ुद-ग़रज़ मुझे दोनों हैं ना-पसंद

हमें पीने से मतलब है जगह की क़ैद क्या 'बेख़ुद' उसी का नाम जन्नत रख दिया बोतल जहाँ रख दी

वो कुछ मुस्कुराना वो कुछ झेंप जाना जवानी अदाएँ सिखाती हैं क्या क्या

चश्म-ए-बद-दूर वो भोले भी हैं नादाँ भी हैं ज़ुल्म भी मुझ पे कभी सोच-समझ कर न हुआ

हूरों से न होगी ये मुदारात किसी की याद आएगी जन्नत में मुलाक़ात किसी की

मुँह में वाइज़ के भी भर आता है पानी अक्सर जब कभी तज़्किरा-ए-जाम-ए-शराब आता है

तुम को आशुफ़्ता-मिज़ाजों की ख़बर से क्या काम तुम सँवारा करो बैठे हुए गेसू अपने

झूटा जो कहा मैं ने तो शर्मा के वो बोले अल्लाह बिगाड़े न बनी बात किसी की

चलने की नहीं आज कोई घात किसी की सुनने के नहीं वस्ल में हम बात किसी की

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