आँखें न जीने देंगी तिरी बे-वफ़ा मुझे क्यूँ खिड़कियों से झाँक रही है क़ज़ा मुझे
Top 20 Sher Series
Shayari of Imdad Ali Bahr
Shayari of Imdad Ali Bahr ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.
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Series se pehle kuch standout sher padhein.
हम न कहते थे हँसी अच्छी नहीं आ गई आख़िर रुकावट देखिए
ख़्वाहिश-ए-दीदार में आँखें भी हैं मेरी रक़ीब सात पर्दों में छुपा रक्खा है उस के नूर को
मुझ को रोने तो दो दिखा दूँगा बुलबुला है ये आसमान नहीं
जूता नया पहन के वो पंजों के बल चले कपड़े बदल के जामे से बाहर निकल चले
काफ़िर-ए-इश्क़ हूँ मैं सब से मोहब्बत है मुझे एक बुत क्या कि समाया है कलीसा दिल में
किसी ने का'बा बनाया किसी ने बुत-ख़ाना बना न एक घरौंदा तुम्हारे घर की तरह
दीवानगी में फेंक रहे थे जो हम लिबास उतरी क़बा बुख़ार बदन से उतर गया
मेरा दिल किस ने लिया नाम बताऊँ किस का मैं हूँ या आप हैं घर में कोई आया न गया
भटक के कोई गया दैर को कोई का'बे अजीब भूल-भुलय्याँ है मरहला दिल का
बे-तरह दिल में भरा रहता है ज़ुल्फ़ों का धुआँ दम निकल जाए किसी रोज़ न घुट कर अपना
उँगलियाँ तू ने जो ऐ रश्क-ए-चमन चटकाईं मुझ को ग़ुंचों के चटकने की सदाएँ आईं
तलाश-ए-यार में गर्दिश को मैं तौफ़-ए-हरम समझूँ करूँ चारों-तरफ़ सज्दे कि वो हर-सू निकलते हैं
मुद्दत से इल्तिफ़ात मिरे हाल पर नहीं कुछ तो कजी है दिल में कि सीधी नज़र नहीं
आँखें न जीने देंगी तिरी बे-वफ़ा मुझे क्यूँ खिड़कियों से झाँक रही है क़ज़ा मुझे
हम न कहते थे हँसी अच्छी नहीं आ गई आख़िर रुकावट देखिए
ख़्वाहिश-ए-दीदार में आँखें भी हैं मेरी रक़ीब सात पर्दों में छुपा रक्खा है उस के नूर को
मुझ को रोने तो दो दिखा दूँगा बुलबुला है ये आसमान नहीं
जूता नया पहन के वो पंजों के बल चले कपड़े बदल के जामे से बाहर निकल चले
काफ़िर-ए-इश्क़ हूँ मैं सब से मोहब्बत है मुझे एक बुत क्या कि समाया है कलीसा दिल में
किसी ने का'बा बनाया किसी ने बुत-ख़ाना बना न एक घरौंदा तुम्हारे घर की तरह
दीवानगी में फेंक रहे थे जो हम लिबास उतरी क़बा बुख़ार बदन से उतर गया
मेरा दिल किस ने लिया नाम बताऊँ किस का मैं हूँ या आप हैं घर में कोई आया न गया
भटक के कोई गया दैर को कोई का'बे अजीब भूल-भुलय्याँ है मरहला दिल का
बे-तरह दिल में भरा रहता है ज़ुल्फ़ों का धुआँ दम निकल जाए किसी रोज़ न घुट कर अपना
उँगलियाँ तू ने जो ऐ रश्क-ए-चमन चटकाईं मुझ को ग़ुंचों के चटकने की सदाएँ आईं
तलाश-ए-यार में गर्दिश को मैं तौफ़-ए-हरम समझूँ करूँ चारों-तरफ़ सज्दे कि वो हर-सू निकलते हैं
मुद्दत से इल्तिफ़ात मिरे हाल पर नहीं कुछ तो कजी है दिल में कि सीधी नज़र नहीं
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Shayari of Imdad Ali Bahr FAQs
Imdad Ali Bahr Top 20 me kya milega?
Imdad Ali Bahr ke selected sher readable cards, internal detail links, aur writer discovery ke saath milenge.
Kya is page ki links internal hain?
Haan, collection links, writer links aur detail links sab Kuch Alfaaz ke internal routes par map kiye gaye hain.
Collection ko kaise explore karein?
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