Top 20 Sher Series

Shayari of Zeb Ghauri

Shayari of Zeb Ghauri ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.

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Sher

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Featured Picks

Series se pehle kuch standout sher padhein.

ज़ख़्म लगा कर उस का भी कुछ हाथ खुला मैं भी धोका खा कर कुछ चालाक हुआ

बड़े अज़ाब में हूँ मुझ को जान भी है अज़ीज़ सितम को देख के चुप भी रहा नहीं जाता

मिरी जगह कोई आईना रख लिया होता न जाने तेरे तमाशे में मेरा काम है क्या

दिल को सँभाले हँसता बोलता रहता हूँ लेकिन सच पूछो तो 'ज़ेब' तबीअत ठीक नहीं होती

घसीटते हुए ख़ुद को फिरोगे 'ज़ेब' कहाँ चलो कि ख़ाक को दे आएँ ये बदन उस का

जाग के मेरे साथ समुंदर रातें करता है जब सब लोग चले जाएँ तो बातें करता है

तलाश एक बहाना था ख़ाक उड़ाने का पता चला कि हमें जुस्तुजू-ए-यार न थी

मैं लाख इसे ताज़ा रखूँ दिल के लहू से लेकिन तिरी तस्वीर ख़याली ही रहेगी

एक किरन बस रौशनियों में शरीक नहीं होती दिल के बुझने से दुनिया तारीक नहीं होती

मैं तो चाक पे कूज़ा-गर के हाथ की मिट्टी हूँ अब ये मिट्टी देख खिलौना कैसे बनती है

खुली छतों से चाँदनी रातें कतरा जाएँगी कुछ हम भी तन्हाई के आदी हो जाएँगे

उलट रही थीं हवाएँ वरक़ वरक़ उस का लिखी गई थी जो मिट्टी पे वो किताब था वो

धो के तू मेरा लहू अपने हुनर को न छुपा कि ये सुर्ख़ी तिरी शमशीर का जौहर ही तो है

एक झोंका हवा का आया 'ज़ेब' और फिर मैं ग़ुबार भी न रहा

ज़ख़्म लगा कर उस का भी कुछ हाथ खुला मैं भी धोका खा कर कुछ चालाक हुआ

बड़े अज़ाब में हूँ मुझ को जान भी है अज़ीज़ सितम को देख के चुप भी रहा नहीं जाता

मिरी जगह कोई आईना रख लिया होता न जाने तेरे तमाशे में मेरा काम है क्या

दिल को सँभाले हँसता बोलता रहता हूँ लेकिन सच पूछो तो 'ज़ेब' तबीअत ठीक नहीं होती

घसीटते हुए ख़ुद को फिरोगे 'ज़ेब' कहाँ चलो कि ख़ाक को दे आएँ ये बदन उस का

जाग के मेरे साथ समुंदर रातें करता है जब सब लोग चले जाएँ तो बातें करता है

तलाश एक बहाना था ख़ाक उड़ाने का पता चला कि हमें जुस्तुजू-ए-यार न थी

मैं लाख इसे ताज़ा रखूँ दिल के लहू से लेकिन तिरी तस्वीर ख़याली ही रहेगी

एक किरन बस रौशनियों में शरीक नहीं होती दिल के बुझने से दुनिया तारीक नहीं होती

मैं तो चाक पे कूज़ा-गर के हाथ की मिट्टी हूँ अब ये मिट्टी देख खिलौना कैसे बनती है

खुली छतों से चाँदनी रातें कतरा जाएँगी कुछ हम भी तन्हाई के आदी हो जाएँगे

उलट रही थीं हवाएँ वरक़ वरक़ उस का लिखी गई थी जो मिट्टी पे वो किताब था वो

धो के तू मेरा लहू अपने हुनर को न छुपा कि ये सुर्ख़ी तिरी शमशीर का जौहर ही तो है

एक झोंका हवा का आया 'ज़ेब' और फिर मैं ग़ुबार भी न रहा

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Shayari of Zeb Ghauri FAQs

Zeb Ghauri Top 20 me kya milega?

Zeb Ghauri ke selected sher readable cards, internal detail links, aur writer discovery ke saath milenge.

Kya is page ki links internal hain?

Haan, collection links, writer links aur detail links sab Kuch Alfaaz ke internal routes par map kiye gaye hain.

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