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Shayari on Tears

Shayari on Tears ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.

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Series se pehle kuch standout sher padhein.

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

ग़ालिब कहते हैं कि सिर्फ़ साँस लेना या ज़िंदा रहना काफ़ी नहीं है, जज़्बे में शिद्दत होनी चाहिए। जब तक इंसान का दर्द इतना गहरा न हो कि वह आँखों से लहू बनकर बहे, तब तक उस खून का कोई मतलब नहीं। यहाँ खून का मतलब गहरा इश्क़ और पीड़ा है जो दिखाई देनी चाहिए।

~ Unknown

मिरी रूह की हक़ीक़त मिरे आँसुओं से पूछो मिरा मज्लिसी तबस्सुम मिरा तर्जुमाँ नहीं है

रोज़ अच्छे नहीं लगते आँसू ख़ास मौक़ों पे मज़ा देते हैं

एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में बूँद भर पानी से सारी आबरू पानी हुई

शायर कहता है कि महबूब की महफिल में मैं अपने जज़्बात काबू में न रख सका और एक आँसू निकल पड़ा। उस एक बूँद ने मुझे 'डुबो' दिया, यानी मेरी सारी इज्ज़त पानी में मिल गई; यहाँ 'पानी होना' मुहावरे का प्रयोग इज्ज़त जाने और शर्मिंदा होने के लिए किया गया है।

क्या कहूँ किस तरह से जीता हूँ ग़म को खाता हूँ आँसू पीता हूँ

जो आग लगाई थी तुम ने उस को तो बुझाया अश्कों ने जो अश्कों ने भड़काई है उस आग को ठंडा कौन करे

पहले नहाई ओस में फिर आँसुओं में रात यूँ बूँद बूँद उतरी हमारे घरों में रात

अश्क-ए-ग़म दीदा-ए-पुर-नम से सँभाले न गए ये वो बच्चे हैं जो माँ बाप से पाले न गए

क्या कहूँ दीदा-ए-तर ये तो मिरा चेहरा है संग कट जाते हैं बारिश की जहाँ धार गिरे

~ Shakeb Jalali

इतने आँसू तो न थे दीदा-ए-तर के आगे अब तो पानी ही भरा रहता है घर के आगे

थमे आँसू तो फिर तुम शौक़ से घर को चले जाना कहाँ जाते हो इस तूफ़ान में पानी ज़रा ठहरे

आँसू हमारे गिर गए उन की निगाह से इन मोतियों की अब कोई क़ीमत नहीं रही

आँखों तक आ सकी न कभी आँसुओं की लहर ये क़ाफ़िला भी नक़्ल-ए-मकानी में खो गया

~ Unknown

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

ग़ालिब कहते हैं कि सिर्फ़ साँस लेना या ज़िंदा रहना काफ़ी नहीं है, जज़्बे में शिद्दत होनी चाहिए। जब तक इंसान का दर्द इतना गहरा न हो कि वह आँखों से लहू बनकर बहे, तब तक उस खून का कोई मतलब नहीं। यहाँ खून का मतलब गहरा इश्क़ और पीड़ा है जो दिखाई देनी चाहिए।

~ Unknown

मिरी रूह की हक़ीक़त मिरे आँसुओं से पूछो मिरा मज्लिसी तबस्सुम मिरा तर्जुमाँ नहीं है

रोज़ अच्छे नहीं लगते आँसू ख़ास मौक़ों पे मज़ा देते हैं

एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में बूँद भर पानी से सारी आबरू पानी हुई

शायर कहता है कि महबूब की महफिल में मैं अपने जज़्बात काबू में न रख सका और एक आँसू निकल पड़ा। उस एक बूँद ने मुझे 'डुबो' दिया, यानी मेरी सारी इज्ज़त पानी में मिल गई; यहाँ 'पानी होना' मुहावरे का प्रयोग इज्ज़त जाने और शर्मिंदा होने के लिए किया गया है।

उस ने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया मुद्दतों बअ'द मिरी आँखों में आँसू आए

~ Unknown

क्या कहूँ किस तरह से जीता हूँ ग़म को खाता हूँ आँसू पीता हूँ

घास में जज़्ब हुए होंगे ज़मीं के आँसू पाँव रखता हूँ तो हल्की सी नमी लगती है

पहले नहाई ओस में फिर आँसुओं में रात यूँ बूँद बूँद उतरी हमारे घरों में रात

ये आँसू बे-सबब जारी नहीं है मुझे रोने की बीमारी नहीं है

क्या कहूँ दीदा-ए-तर ये तो मिरा चेहरा है संग कट जाते हैं बारिश की जहाँ धार गिरे

~ Shakeb Jalali

होती है शाम आँख से आँसू रवाँ हुए ये वक़्त क़ैदियों की रिहाई का वक़्त है

थमे आँसू तो फिर तुम शौक़ से घर को चले जाना कहाँ जाते हो इस तूफ़ान में पानी ज़रा ठहरे

आँखों तक आ सकी न कभी आँसुओं की लहर ये क़ाफ़िला भी नक़्ल-ए-मकानी में खो गया

~ Unknown

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Shayari on Tears FAQs

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