रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
ग़ालिब कहते हैं कि सिर्फ़ साँस लेना या ज़िंदा रहना काफ़ी नहीं है, जज़्बे में शिद्दत होनी चाहिए। जब तक इंसान का दर्द इतना गहरा न हो कि वह आँखों से लहू बनकर बहे, तब तक उस खून का कोई मतलब नहीं। यहाँ खून का मतलब गहरा इश्क़ और पीड़ा है जो दिखाई देनी चाहिए।