ai khuda-e-junun khuda-hafiz bandagi ke fusun khuda-hafiz jin labon se tumhen diya bosa kaise un se kahun khuda-hafiz zahiran ek lams tha us ka zakhm-ha-e-darun khuda-hafiz chashm-e-nam ki hava mubarak ho ai mire dil ke khuun khuda-hafiz tera jaana ajiib lagta tha ab himayat men huun khuda-hafiz halat-e-raqs men hai thahrav iztirab-o-sukun khuda-hafiz tum mujhe sun ke an-suni karna laakh kahta rahun khuda-hafiz main mohabbat ki aankh se nikla akhiri ashk huun khuda-hafiz ai khuda-e-junun khuda-hafiz bandagi ke fusun khuda-hafiz jin labon se tumhein diya bosa kaise un se kahun khuda-hafiz zahiran ek lams tha us ka zakhm-ha-e-darun khuda-hafiz chashm-e-nam ki hawa mubarak ho ai mere dil ke khun khuda-hafiz tera jaana ajib lagta tha ab himayat mein hun khuda-hafiz haalat-e-raqs mein hai thahraw iztirab-o-sukun khuda-hafiz tum mujhe sun ke an-suni karna lakh kahta rahun khuda-hafiz main mohabbat ki aankh se nikla aakhiri ashk hun khuda-hafiz
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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मुसलसल वार करने पर भी ज़र्रा भर नहीं टूटा मैं पत्थर हो गया फिर भी तेरा ख़ंजर नहीं टूटा मुझे बर्बाद करने तक ही उस के आस्ताँ टूटे मेरा दिल टूटने के बा'द उस का घर नहीं टूटा हम उस का ग़म भला क़िस्मत पे कैसे टाल सकते हैं हमारे हाथ में टूटा है वो गिरकर नहीं टूटा सरों पर आसमाँ आँखों से आईने नज़र से दिल बहुत कुछ टूट सकता था बहुत कुछ पर नहीं टूटा तिलिस्म-ए-यार में जब भी कमी आई नमी आई उन आँखों में जिन्हें लगता था जादूगर नहीं टूटा तेरे भेजे हुए तेशों की धारें तेज़ थी 'हाफ़ी' मगर इनसे ये कोह-ए-ग़म ज़ियादा तर नहीं टूटा
Tehzeeb Hafi
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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
Dagh Dehlvi
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उदास लड़कियों से राब्ता निभाता हूँ मैं एक फूल हूँ जो तितलियाँ बचाता हूँ जी मैं ही इश्क़ में हारे हुओं का मुर्शिद हूँ जी मैं ही हर सदी में क़ैस बन के आता हूँ सताई होती हैं जो आप के समुंदर की मैं ऐसी मछलियों के साथ गोते खाता हूँ किसी के वास्ते काँटे नहीं बिछाता मैं मगर यूँँ भी नहीं के काँटों को हटाता हूँ मैं मौसमी हँसी का मारा हूँ कि कोई दिन मैं साल भर में कोई दिन ही मुस्कुराता हूँ बदन भी आते हैं और हिचकियाँ भी आती हैं मैं जिन को भूल गया उन को याद आता हूँ निभाने जैसा तो कुछ भी नहीं है उस में मगर वो मर न जाए कहीं इस लिए निभाता हूँ
Rishabh Sharma
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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था
Tehzeeb Hafi
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