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aisa vo be-shumar-o-qatar intizar tha pahli hi baar dusri baar intizar tha khamoshi-e-khizan thi chaman-dar-chaman tamam shakh-o-shajar men shor-e-bahar intizar tha dekha to khalvat-e-khas-o-khashak khvab men raushan koi charaghh-e-sharar intizar tha bahar bhi gard umiid ki udti thi duur duur andar bhi charon-samt ghhubar intizar tha phaile hue vo ghaas ke takhte na the vahan dar-asl ek silsila-var intizar tha koi khabar thi amad-o-imkan-e-subh ki aur us ke ird-gird hisar intizar tha kis ke guman men the nae mausamon ke rang kis ka mire siva sarokar intizar tha umda hua hujum-e-tamasha tha daen-baen tanha thiin ankhen aur hazar intizar tha chakkar the paanv men koi sham-o-sahar 'zafar' uupar se mere sar pe savar intizar tha aisa wo be-shumar-o-qatar intizar tha pahli hi bar dusri bar intizar tha khamoshi-e-khizan thi chaman-dar-chaman tamam shakh-o-shajar mein shor-e-bahaar intizar tha dekha to khalwat-e-khas-o-khashak khwab mein raushan koi charagh-e-sharar intizar tha bahar bhi gard umid ki udti thi dur dur andar bhi chaaron-samt ghubar intizar tha phaile hue wo ghas ke takhte na the wahan dar-asl ek silsila-war intizar tha koi khabar thi aamad-o-imkan-e-subh ki aur us ke ird-gird hisar intizar tha kis ke guman mein the nae mausamon ke rang kis ka mere siwa sarokar intizar tha umda hua hujum-e-tamasha tha daen-baen tanha thin aankhen aur hazar intizar tha chakkar the panw mein koi sham-o-sahar 'zafar' upar se mere sar pe sawar intizar tha

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते कुछ और थक गया हूँ आराम करते करते अंदर सब आ गया है बाहर का भी अँधेरा ख़ुद रात हो गया हूँ मैं शाम करते करते ये उम्र थी ही ऐसी जैसी गुज़ार दी है बदनाम होते होते बदनाम करते करते फँसता नहीं परिंदा है भी इसी फ़ज़ा में तंग आ गया हूँ दिल को यूँँ दाम करते करते कुछ बे-ख़बर नहीं थे जो जानते हैं मुझ को मैं कूच कर रहा था बिसराम करते करते सर से गुज़र गया है पानी तो ज़ोर करता सब रोक रुकते रुकते सब थाम करते करते किस के तवाफ़ में थे और ये दिन आ गए हैं क्या ख़ाक थी कि जिस को एहराम करते करते जिस मोड़ से चले थे पहुँचे हैं फिर वहीं पर इक राएगाँ सफ़र को अंजाम करते करते आख़िर 'ज़फ़र' हुआ हूँ मंज़र से ख़ुद ही ग़ाएब उस्लूब-ए-ख़ास अपना मैं आम करते करते

Zafar Iqbal

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