ghazalKuch Alfaaz

बादशाहों को सिखाया है क़लंदर होना आप आसान समझते हैं मुनव्वर होना एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना सिर्फ़ बच्चों की मोहब्बत ने क़दम रोक लिए वर्ना आसान था मेरे लिए बे-घर होना हम को मा'लूम है शोहरत की बुलंदी हम ने क़ब्र की मिट्टी का देखा है बराबर होना इस को क़िस्मत की ख़राबी ही कहा जाएगा आप का शहर में आना मिरा बाहर होना सोचता हूँ तो कहानी की तरह लगता है रास्ते से मिरा तकना तिरा छत पर होना मुझ को क़िस्मत ही पहुँचने नहीं देती वर्ना एक ए'ज़ाज़ है उस दर का गदागर होना सिर्फ़ तारीख़ बताने के लिए ज़िंदा हूँ अब मिरा घर में भी होना है कैलेंडर होना

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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क्या कहेगा कभी मिलने भी अगर आएगा वो अब वफ़ादारी की क़स्में तो नहीं खाएगा वो हम समझते थे कि हम उस को भुला सकते हैं वो समझता था हमें भूल नहीं पाएगा वो कितना सोचा था पर इतना तो नहीं सोचा था याद बन जाएगा वो ख़्वाब नज़र आएगा वो सब के होते हुए इक रोज़ वो तन्हा होगा फिर वो ढूँढेगा हमें और नहीं पाएगा वो इत्तिफ़ाक़न जो कभी सामने आया 'अजमल' अब वो तन्हा तो न होगा जो ठहर जाएगा वो

Ajmal Siraj

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दर्द सीने में छुपाए रक्खा हम ने माहौल बनाए रक्खा मौत आई थी कई दिन पहले उस को बातों में लगाए रक्खा दश्त में आई बला टलने तक शोर चिड़ियों ने मचाए रक्खा वरना तारों को शिकायत होती हम ने हर ज़ख़्म छुपाए रक्खा काम दुश्वार था फिर भी दानिश ख़ुद को आसान बनाए रक्खा

Madan Mohan Danish

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उसे इस वक़्त इस महफ़िल में होना चाहिए था ख़ैर मुहब्बत में अना को दिल से खोना चाहिए था ख़ैर बिछड़ते वक़्त उस की आँख में कुछ भी नहीं देखा उसे दो पल तो पलकों को भिगोना चाहिए था ख़ैर मुझे मसरूफ़ लम्हों ने कही फ़ुर्सत की सच्चाई उसे बस एक अच्छा सा खिलौना चाहिए था ख़ैर मेरे क़िस्सों में सुन कर नाम उस का लोग हँसते थे उसे इस बात पर थोड़ा तो रोना चाहिए था ख़ैर मेरे दिल की तसल्ली के लिए तस्वीर भेजी है तुम्हें इस वक़्त मेरे पास होना चाहिए था ख़ैर

Sapna Moolchandani

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मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है

Munawwar Rana

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ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है इसी ने हम को तमाशा बना के रक्खा है वो किस तरह हमें इनआ'म से नवाज़ेगा वो जिस ने हाथों को कासा बना के रक्खा है यहाँ पे कोई बचाने तुम्हें न आएगा समुंदरों ने जज़ीरा बना के रक्खा है तमाम उम्र का हासिल है ये हुनर मेरा कि मैं ने शीशे को हीरा बना के रक्खा है किसे किसे अभी सज्दा-गुज़ार होना है अमीर-ए-शहर ने खाता बना के रक्खा है मैं बच गया तो यक़ीनन ये मो'जिज़ा होगा सभी ने मुझ को निशाना बना के रक्खा है कोई बता दे ये सूरज को जा के हम ने भी शजर को धूप में छाता बना के रक्खा है

Munawwar Rana

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सारी दौलत तिरे क़दमों में पड़ी लगती है तू जहाँ होता है क़िस्मत भी गड़ी लगती है ऐसे रोया था बिछड़ते हुए वो शख़्स कभी जैसे सावन के महीने में झड़ी लगती है हम भी अपने को बदल डालेंगे रफ़्ता रफ़्ता अभी दुनिया हमें जन्नत से बड़ी लगती है ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है तू मिरे साथ अगर है तो अँधेरा कैसा रात ख़ुद चाँद सितारों से जड़ी लगती है मैं रहूँ या न रहूँ नाम रहेगा मेरा ज़िंदगी उम्र में कुछ मुझ से बड़ी लगती है

Munawwar Rana

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घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं लड़कियाँ धान के पौदों की तरह होती हैं उड़ के इक रोज़ बहुत दूर चली जाती हैं घर की शाख़ों पे ये चिड़ियों की तरह होती हैं सहमी सहमी हुई रहती हैं मकान-ए-दिल में आरज़ूएँ भी ग़रीबों की तरह होती हैं टूट कर ये भी बिखर जाती हैं इक लम्हे में कुछ उमीदें भी घरोंदों की तरह होती हैं आप को देख के जिस वक़्त पलटती है नज़र मेरी आँखें मिरी आँखों की तरह होती हैं

Munawwar Rana

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वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है रेत पर ओस से इक नाम लिखा होता है ख़ाक आँखों से लगाई तो ये एहसास हुआ अपनी मिट्टी से हर इक शख़्स जुड़ा होता है सारी दुनिया का सफ़र ख़्वाब में कर डाला है कोई मंज़र हो मिरा देखा हुआ होता है मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है ख़ौफ़ में डूबे हुए शहर की क़िस्मत है यही मुंतज़िर रहता है हर शख़्स कि क्या होता है

Munawwar Rana

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