ghazalKuch Alfaaz

bichhadne vaale ka kyunkar na ghham kiya jaae ye bojh aisa nahin hai ki kam kiya jaae ab intizar karen kya kisi muarrikh ka chalo ye vaqia khud hi raqam kiya jaae main ek baar nahin baar baar hansta huun kisi tarah to udasi ko kam kiya jaae koi sabil nahin pyaas ko bujhane ki sivae is ke ki ankhon ko nam kiya jaae ye khud se milne milane ki ek surat hai ki rabta zara duniya se kam kiya jaae vo aur honge jo insaf chahte hain tira gunahgar huun mujh par karam kiya jaae bichhadne wale ka kyunkar na gham kiya jae ye bojh aisa nahin hai ki kam kiya jae ab intizar karen kya kisi muarrikh ka chalo ye waqia khud hi raqam kiya jae main ek bar nahin bar bar hansta hun kisi tarah to udasi ko kam kiya jae koi sabil nahin pyas ko bujhane ki siwae is ke ki aankhon ko nam kiya jae ye khud se milne milane ki ek surat hai ki rabta zara duniya se kam kiya jae wo aur honge jo insaf chahte hain tera gunahgar hun mujh par karam kiya jae

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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नया इक रिश्ता पैदा क्यूँँ करें हम बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँँ करें हम ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँँ करें हम ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँँ करें हम वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँँ करें हम हमारी ही तमन्ना क्यूँँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँँ करें हम किया था अहद जब लम्हों में हम ने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँँ करें हम नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँँ करें हम ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँँ करें हम

Jaun Elia

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दर-गुज़र जितना किया है वही काफ़ी है मुझे अब तुझे क़त्ल भी कर दूँ तो मुआ'फ़ी है मुझे मसअला ऐसे कोई हल तो न होगा शायद शे'र कहना ही मिरे ग़म की तलाफ़ी है मुझे दफ़अ'तन इक नए एहसास ने चौंका सा दिया मैं तो समझा था कि हर साँस इज़ाफ़ी है मुझे मैं न कहता था दवाएँ नहीं काम आएँगी जानता था तिरी आवाज़ ही शाफ़ी है मुझे इस से अंदाज़ा लगाओ कि मैं किस हाल में हूँ ग़ैर का ध्यान भी अब वा'दा-ख़िलाफ़ी है मुझे वो कहीं सामने आ जाए तो क्या हो 'जव्वाद' याद ही उस की अगर सीना-शिगाफ़ी है मुझे

Jawwad Sheikh

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पानी की चोट चोट है कच्चे घड़ों से पूछ कम उम्र में बियाही गई लड़कियों से पूछ किस किस से तेरे बारे में पूछा नहीं बता जा डाकियों से पूछ जा कंडक्टरों से पूछ ये हिज्र कैसे काटता है आदमी की उम्र नदियों से कटने वाले बड़े पर्वतों से पूछ कैसे जुदा किया है उसे कैसे ख़ुश रहें बरसे बग़ैर जाते हुए बादलों से पूछ

Rishabh Sharma

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किस से इज़हार-ए-मुद्दआ कीजे आप मिलते नहीं हैं क्या कीजे हो न पाया ये फ़ैसला अब तक आप कीजे तो क्या किया कीजे आप थे जिस के चारा-गर वो जवाँ सख़्त बीमार है दुआ कीजे एक ही फ़न तो हम ने सीखा है जिस से मिलिए उसे ख़फ़ा कीजे है तक़ाज़ा मिरी तबीअ'त का हर किसी को चराग़-पा कीजे है तो बारे ये आलम-ए-असबाब बे-सबब चीख़ने लगा कीजे आज हम क्या गिला करें उस से गिला-ए-तंगी-ए-क़बा कीजे नुत्क़ हैवान पर गराँ है अभी गुफ़्तुगू कम से कम किया कीजे हज़रत-ए-ज़ुल्फ़-ए-ग़ालिया-अफ़्शाँ नाम अपना सबा सबा कीजे ज़िंदगी का अजब मोआ'मला है एक लम्हे में फ़ैसला कीजे मुझ को आदत है रूठ जाने की आप मुझ को मना लिया कीजे मिलते रहिए इसी तपाक के साथ बे-वफ़ाई की इंतिहा कीजे कोहकन को है ख़ुद-कुशी ख़्वाहिश शाह-बानो से इल्तिजा कीजे मुझ से कहती थीं वो शराब आँखें आप वो ज़हर मत पिया कीजे रंग हर रंग में है दाद-तलब ख़ून थूकूँ तो वाह-वा कीजे

Jaun Elia

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