ghazalKuch Alfaaz

ख़त्म कैसे ज़िंदगी करते कि दुनिया देखती किस के दर पे ख़ुद-कुशी करते कि दुनिया देखती मुफ़लिसी थी और हम थे घर के इकलौते चराग़ वरना ऐसी रौशनी करते कि दुनिया देखती सर्द महरी आप की रिश्ते में हाइल हो गई वरना हम वो आशिक़ी करते कि दुनिया देखती ख़ाक सहरा की उड़ाते फिर रहे हो तुम कहाँ शहर में आवारगी करते कि दुनिया देखती तुम भी 'काशिफ़' फाइलातुन में उलझ कर रह गए सीधे सीधे शा'इरी करते कि दुनिया देखती

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वैसे मैं ने दुनिया में क्या देखा है तुम कहते हो तो फिर अच्छा देखा है मैं उस को अपनी वहशत तोहफ़े में दूँ हाथ उठाए जिस ने सहरा देखा है बिन देखे उस की तस्वीर बना लूँगा आज तो मैं ने उस को इतना देखा है एक नज़र में मंज़र कब खुलते हैं दोस्त तू ने देखा भी है तो क्या देखा है इश्क़ में बंदा मर भी सकता है मैं ने दिल की दस्तावेज़ में लिखा देखा है मैं तो आँखें देख के ही बतला दूँगा तुम में से किस किस ने दरिया देखा है आगे सीधे हाथ पे एक तराई है मैं ने पहले भी ये रस्ता देखा है तुम को तो इस बाग़ का नाम पता होगा तुम ने तो इस शहर का नक़्शा देखा है

Tehzeeb Hafi

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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उसी के नाम से हर काम का आग़ाज़ करता हूँ जबीं है ख़ाक पर सो अर्श तक परवाज़ करता हूँ मेरे दुश्मन भी मेरी इस अदा पर दाद देते हैं मैं इस अंदाज़ से उन को नज़र अंदाज़ करता हूँ मुझे इक राज़ से पर्दा उठाना जब भी होता है किसी को राज़दारी से शरीक-ए-राज़ करता हूँ

Kashif Sayyed

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भले आधा अधूरा जी रहा है ये क्या कम है दीवाना जी रहा है कभी फ़ुर्सत मिले तो देख आ कर तेरा बीमार अच्छा जी रहा है जिसे मरता हुआ छोड़ा था तुम ने मेरे अंदर वो लड़का जी रहा है सभी को मौत का खटका है लेकिन जिसे आता है जीना जी रहा है कोई उस एक लम्हे में मरा था कोई वो एक लम्हा जी रहा है उसे तन्हा न समझा जाए 'काशिफ़' मोहब्बत में जो तन्हा जी रहा है

Kashif Sayyed

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बह गई याद उस की पानी में अब बचा क्या है ज़िंदगानी में आप ने ग़ौर से पढ़ा ही नहीं हम भी मौजूद थे कहानी में काश तुम सेे मिलें किसी दिन यूँँ जैसे मिलता है पानी पानी में

Kashif Sayyed

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मुसलसल रो रहा हूँ फिर भी क्यूँँ रोने से डरता हूँ जिसे पाया नहीं अब तक उसे खोने से डरता हूँ सुनहरा ख़्वाब बनकर इक अज़ाब आँखों पे उतरा था ज़माना हो गया पर आज भी सोने से डरता हूँ बहुत ज़रख़ेज़ है दिल की ज़मीं मालूम है लेकिन वफ़ा के बीज इस मिट्टी में फिर बोने से डरता हूँ

Kashif Sayyed

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इस पार मैं हूँ झील के उस पार आप हैं लहरों के आइनों में लगातार आप हैं ऐ काश वो ये पूछें तुम्हें क्या पसंद है बे-साख़्ता मैं कह पड़ूँ सरकार आप हैं उस की ख़मोशियों की बलागत न पूछिए जिस के लब-ए-ख़मोश का इज़हार आप हैं अब एहतिराम करने लगे मेरा सारे ग़म किस ने बता दिया मेरे ग़म-ख़्वार आप हैं कलियों के लब पे सजती है मुस्कान आप की हर मौसम-ए-बहार का सिंगार आप हैं

Kashif Sayyed

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