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बह गई याद उस की पानी में अब बचा क्या है ज़िंदगानी में आप ने ग़ौर से पढ़ा ही नहीं हम भी मौजूद थे कहानी में काश तुम सेे मिलें किसी दिन यूँँ जैसे मिलता है पानी पानी में

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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एक और शख़्स छोड़ कर चला गया तो क्या हुआ हमारे साथ कौन सा ये पहली मर्तबा हुआ अज़ल से इन हथेलियों में हिज्र की लकीर थी तुम्हारा दुख तो जैसे मेरे हाथ में बड़ा हुआ मेरे ख़िलाफ़ दुश्मनों की सफ़ में है वो और मैं बहुत बुरा लगूँगा उस पर तीर खींचता हुआ

Tehzeeb Hafi

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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था

Tehzeeb Hafi

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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मेरे दिल में ये तेरे सिवा कौन है? तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है? हम मोहब्बत में हारे हुए लोग हैं और मोहब्बत में जीता हुआ कौन है? मेरे पहलू से उठ के गया कौन है? तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है? तू ने जाते हुए ये बताया नहीं मैं तेरा कौन हूँ तू मेरा कौन है

Tehzeeb Hafi

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भले आधा अधूरा जी रहा है ये क्या कम है दीवाना जी रहा है कभी फ़ुर्सत मिले तो देख आ कर तेरा बीमार अच्छा जी रहा है जिसे मरता हुआ छोड़ा था तुम ने मेरे अंदर वो लड़का जी रहा है सभी को मौत का खटका है लेकिन जिसे आता है जीना जी रहा है कोई उस एक लम्हे में मरा था कोई वो एक लम्हा जी रहा है उसे तन्हा न समझा जाए 'काशिफ़' मोहब्बत में जो तन्हा जी रहा है

Kashif Sayyed

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उसी के नाम से हर काम का आग़ाज़ करता हूँ जबीं है ख़ाक पर सो अर्श तक परवाज़ करता हूँ मेरे दुश्मन भी मेरी इस अदा पर दाद देते हैं मैं इस अंदाज़ से उन को नज़र अंदाज़ करता हूँ मुझे इक राज़ से पर्दा उठाना जब भी होता है किसी को राज़दारी से शरीक-ए-राज़ करता हूँ

Kashif Sayyed

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इस पार मैं हूँ झील के उस पार आप हैं लहरों के आइनों में लगातार आप हैं ऐ काश वो ये पूछें तुम्हें क्या पसंद है बे-साख़्ता मैं कह पड़ूँ सरकार आप हैं उस की ख़मोशियों की बलागत न पूछिए जिस के लब-ए-ख़मोश का इज़हार आप हैं अब एहतिराम करने लगे मेरा सारे ग़म किस ने बता दिया मेरे ग़म-ख़्वार आप हैं कलियों के लब पे सजती है मुस्कान आप की हर मौसम-ए-बहार का सिंगार आप हैं

Kashif Sayyed

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मुसलसल रो रहा हूँ फिर भी क्यूँँ रोने से डरता हूँ जिसे पाया नहीं अब तक उसे खोने से डरता हूँ सुनहरा ख़्वाब बनकर इक अज़ाब आँखों पे उतरा था ज़माना हो गया पर आज भी सोने से डरता हूँ बहुत ज़रख़ेज़ है दिल की ज़मीं मालूम है लेकिन वफ़ा के बीज इस मिट्टी में फिर बोने से डरता हूँ

Kashif Sayyed

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ख़त्म कैसे ज़िंदगी करते कि दुनिया देखती किस के दर पे ख़ुद-कुशी करते कि दुनिया देखती मुफ़लिसी थी और हम थे घर के इकलौते चराग़ वरना ऐसी रौशनी करते कि दुनिया देखती सर्द महरी आप की रिश्ते में हाइल हो गई वरना हम वो आशिक़ी करते कि दुनिया देखती ख़ाक सहरा की उड़ाते फिर रहे हो तुम कहाँ शहर में आवारगी करते कि दुनिया देखती तुम भी 'काशिफ़' फाइलातुन में उलझ कर रह गए सीधे सीधे शा'इरी करते कि दुनिया देखती

Kashif Sayyed

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