ghazalKuch Alfaaz

मुसलसल रो रहा हूँ फिर भी क्यूँँ रोने से डरता हूँ जिसे पाया नहीं अब तक उसे खोने से डरता हूँ सुनहरा ख़्वाब बनकर इक अज़ाब आँखों पे उतरा था ज़माना हो गया पर आज भी सोने से डरता हूँ बहुत ज़रख़ेज़ है दिल की ज़मीं मालूम है लेकिन वफ़ा के बीज इस मिट्टी में फिर बोने से डरता हूँ

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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उसी के नाम से हर काम का आग़ाज़ करता हूँ जबीं है ख़ाक पर सो अर्श तक परवाज़ करता हूँ मेरे दुश्मन भी मेरी इस अदा पर दाद देते हैं मैं इस अंदाज़ से उन को नज़र अंदाज़ करता हूँ मुझे इक राज़ से पर्दा उठाना जब भी होता है किसी को राज़दारी से शरीक-ए-राज़ करता हूँ

Kashif Sayyed

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बह गई याद उस की पानी में अब बचा क्या है ज़िंदगानी में आप ने ग़ौर से पढ़ा ही नहीं हम भी मौजूद थे कहानी में काश तुम सेे मिलें किसी दिन यूँँ जैसे मिलता है पानी पानी में

Kashif Sayyed

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इस पार मैं हूँ झील के उस पार आप हैं लहरों के आइनों में लगातार आप हैं ऐ काश वो ये पूछें तुम्हें क्या पसंद है बे-साख़्ता मैं कह पड़ूँ सरकार आप हैं उस की ख़मोशियों की बलागत न पूछिए जिस के लब-ए-ख़मोश का इज़हार आप हैं अब एहतिराम करने लगे मेरा सारे ग़म किस ने बता दिया मेरे ग़म-ख़्वार आप हैं कलियों के लब पे सजती है मुस्कान आप की हर मौसम-ए-बहार का सिंगार आप हैं

Kashif Sayyed

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भले आधा अधूरा जी रहा है ये क्या कम है दीवाना जी रहा है कभी फ़ुर्सत मिले तो देख आ कर तेरा बीमार अच्छा जी रहा है जिसे मरता हुआ छोड़ा था तुम ने मेरे अंदर वो लड़का जी रहा है सभी को मौत का खटका है लेकिन जिसे आता है जीना जी रहा है कोई उस एक लम्हे में मरा था कोई वो एक लम्हा जी रहा है उसे तन्हा न समझा जाए 'काशिफ़' मोहब्बत में जो तन्हा जी रहा है

Kashif Sayyed

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ख़त्म कैसे ज़िंदगी करते कि दुनिया देखती किस के दर पे ख़ुद-कुशी करते कि दुनिया देखती मुफ़लिसी थी और हम थे घर के इकलौते चराग़ वरना ऐसी रौशनी करते कि दुनिया देखती सर्द महरी आप की रिश्ते में हाइल हो गई वरना हम वो आशिक़ी करते कि दुनिया देखती ख़ाक सहरा की उड़ाते फिर रहे हो तुम कहाँ शहर में आवारगी करते कि दुनिया देखती तुम भी 'काशिफ़' फाइलातुन में उलझ कर रह गए सीधे सीधे शा'इरी करते कि दुनिया देखती

Kashif Sayyed

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