duniya jise kahte hain jaadu ka khilauna hai mil jaae to mitti hai kho jaae to sona hai achchha sa koi mausam tanha sa koi aalam har vaqt ka rona to be-kar ka rona hai barsat ka badal to divana hai kya jaane kis raah se bachna hai kis chhat ko bhigona hai ye vaqt jo tera hai ye vaqt jo mera hai har gaam pe pahra hai phir bhi ise khona hai ghham ho ki khushi donon kuchh duur ke sathi hain phir rasta hi rasta hai hansna hai na rona hai avara-mizaji ne phaila diya angan ko akash ki chadar hai dharti ka bichhauna hai duniya jise kahte hain jadu ka khilauna hai mil jae to mitti hai kho jae to sona hai achchha sa koi mausam tanha sa koi aalam har waqt ka rona to be-kar ka rona hai barsat ka baadal to diwana hai kya jaane kis rah se bachna hai kis chhat ko bhigona hai ye waqt jo tera hai ye waqt jo mera hai har gam pe pahra hai phir bhi ise khona hai gham ho ki khushi donon kuchh dur ke sathi hain phir rasta hi rasta hai hansna hai na rona hai aawara-mizaji ne phaila diya aangan ko aakash ki chadar hai dharti ka bichhauna hai
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो
Himanshi babra KATIB
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दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी रात जंगल में कोई शम्अ' जलाने से रही फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही
Nida Fazli
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दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे सीधे-सादे लोग थे लेकिन कितने अच्छे लगते थे नफ़रत चढ़ती आँधी जैसी प्यार उबलते चश्मों सा बैरी हूँ या संगी साथी सारे अपने लगते थे बहते पानी दुख-सुख बाँटें पेड़ बड़े बूढ़ों जैसे बच्चों की आहट सुनते ही खेत लहकने लगते थे नदिया पर्बत चाँद निगाहें माला एक कई दाने छोटे छोटे से आँगन भी कोसों फैले लगते थे
Nida Fazli
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कभी कभी यूँँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है हम से पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी हम ने भी इक शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है उस को भूले बरसों गुज़रे लेकिन आज न जाने क्यूँँ आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारन धमकाया है उस बस्ती से छुट कर यूँँ तो हर चेहरे को याद किया जिस से थोड़ी सी अन-बन थी वो अक्सर याद आया है कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें कीं घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है
Nida Fazli
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जाने वालों से राब्ता रखना दोस्तो रस्म-ए-फ़ातिहा रखना घर की ता'मीर चाहे जैसी हो उस में रोने की कुछ जगह रखना मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिए अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना जिस्म में फैलने लगा है शहर अपनी तन्हाइयाँ बचा रखना मिलना-जुलना जहाँ ज़रूरी है मिलने-जुलने का हौसला रखना उम्र करने को है पचास को पार कौन है किस जगह पता रखना
Nida Fazli
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गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया जब तक था आसमान में सूरज सभी का था फिर यूँँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ आलम तमाम चंद मचानों में बट गया ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया
Nida Fazli
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