ghazalKuch Alfaaz

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा शिकस्त-ए-दिल का बाक़ी हम ने ग़ुर्बत में असर रखा लिखा अहल-ए-वतन को ख़त तो इक गोशा कतर रक्खा बराबर आईने के भी न समझे क़द्र वो दिल की इसे ज़ेर-ए-क़दम रक्खा उसे पेश-ए-नज़र रक्खा मिटाए दीदा-ओ-दिल दोनों मेरे अश्क-ए-ख़ूनीं ने अजब ये तिफ़्ल अबतर था न घर रक्खा न दर रक्खा तुम्हारे संग-ए-दर का एक टुकड़ा भी जो हाथ आया अज़ीज़ ऐसा किया मर कर उसे छाती पे धर रक्खा जिनाँ में साथ अपने क्यूँँ न ले जाऊँगा नासेह को सुलूक ऐसा ही मेरे साथ है हज़रत ने कर रक्खा न की किस ने सिफ़ारिश मेरी वक़्त-ए-क़त्ल क़ातिल से कमाँ ने हाथ जोड़े तेग़ ने क़दमों पे सर रक्खा ग़ज़ब बरसे वो मेरे आते ही मालूम होता है जगह ख़ाली जो पाई यार को ग़ैरों ने भर रक्खा बड़ा एहसाँ है मेरे सर पे उस की लग़्ज़िश-ए-पा का कि इस ने बे-तहाशा हाथ मेरे दोश पर रक्खा ज़मीं में दाना-ए-गंदुम सदफ़ में हम हुए गौहर हमारे इज्ज़ ने हर मअ'रका में हम को दर रक्खा तिरे हर नक़्श-ए-पा को रहगुज़र में सज्दा-गह समझे जहाँ तू ने क़दम रक्खा वहाँ मैं ने भी सर रक्खा अमीर अच्छा शगून-ए-मय किया साक़ी की फ़ुर्क़त में जो बरसा अब्र-ए-रहमत जा-ए-मय शीशों में भर रक्खा

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़ अल्लाह अल्लाह ये किब्र और ये ग़ुरूर क्या ख़ुदा का है दूसरा वाइज़ बे-ख़ता मय-कशों पे चश्म-ए-ग़ज़ब हश्र होने दे देखना वाइज़ हम हैं क़हत-ए-शराब से बीमार किस मरज़ की है तू दवा वाइज़ रह चुका मय-कदे में सारी उम्र कभी मय-ख़ाने में भी आ वाइज़ हज्व-ए-मय कर रहा था मिम्बर पर हम जो पहुँचे तो पी गया वाइज़ दुख़्त-ए-रज़ को बुरा मिरे आगे फिर न कहना कभी सुना वाइज़ आज करता हूँ वस्फ़-ए-मय मैं 'अमीर' देखूँ कहता है इस में क्या वाइज़

Ameer Minai

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जब से बुलबुल तू ने दो तिनके लिए टूटती हैं बिजलियाँ इन के लिए है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार सादगी गहना है इस सिन के लिए कौन वीराने में देखेगा बहार फूल जंगल में खिले किन के लिए सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा मैं ने दुनिया छोड़ दी जिन के लिए बाग़बाँ कलियाँ हों हल्के रंग की भेजनी है एक कम-सिन के लिए सब हसीं हैं ज़ाहिदों को ना-पसंद अब कोई हूर आएगी इन के लिए वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए सुब्ह का सोना जो हाथ आता 'अमीर' भेजते तोहफ़ा मोअज़्ज़िन के लिए

Ameer Minai

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बात करने में तो जाती है मुलाक़ात की रात क्या बरी बात है रह जाओ यहीं रात की रात ज़र्रे अफ़्शाँ के नहीं किर्मक-ए-शब-ताब से कम है वो ज़ुल्फ़-ए-अरक़-आलूद कि बरसात की रात ज़ाहिद उस ज़ुल्फ़ फँस जाए तो इतना पूछूँ कहिए किस तरह कटी क़िबला-ए-हाजात की रात शाम से सुब्ह तलक चलते हैं जाम-ए-मय-ए-ऐश ख़ूब होती है बसर अहल-ए-ख़राबात की रात वस्ल चाहा शब-ए-मेराज तो ये उज़्र किया है ये अल्लाह ओ पयम्बर की मुलाक़ात की रात हम मुसाफ़िर हैं ये दुनिया है हक़ीक़त में सरा है तवक़्क़ुफ़ हमें इस जा तो फ़क़त रात की रात चल के अब सो रहो बातें न बनाओ साहिब वस्ल की शब है नहीं हर्फ़-ए-हिकायात की रात लैलतुल-क़द्र है वसलत की दुआ माँग 'अमीर' इस से बेहतर है कहाँ कोई मुनाजात की रात

Ameer Minai

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मिरे बस में या तो या-रब वो सितम-शिआर होता ये न था तो काश दिल पर मुझे इख़्तियार होता पस-ए-मर्ग काश यूँँ ही मुझे वस्ल-ए-यार होता वो सर-ए-मज़ार होता मैं तह-ए-मज़ार होता तिरा मय-कदा सलामत तिरे ख़ुम की ख़ैर साक़ी मिरा नश्शा क्यूँँ उतरता मुझे क्यूँँ ख़ुमार होता मैं हूँ ना-मुराद ऐसा कि बिलक के यास रोती कहीं पा के आसरा कुछ जो उमीद-वार होता नहीं पूछता है मुझ को कोई फूल इस चमन में दिल-ए-दाग़-दार होता तो गले का हार होता वो मज़ा दिया तड़प ने कि ये आरज़ू है या-रब मिरे दोनों पहलुओं में दिल-ए-बे-क़रार होता दम-ए-नज़अ भी जो वो बुत मुझे आ के मुँह दिखाता तो ख़ुदा के मुँह से इतना न मैं शर्मसार होता न मलक सवाल करते न लहद फ़िशार देती सर-ए-राह-ए-कू-ए-क़ातिल जो मिरा मज़ार होता जो निगाह की थी ज़ालिम तो फिर आँख क्यूँँ चुराई वही तीर क्यूँँ न मारा जो जिगर के पार होता मैं ज़बाँ से तुम को सच्चा कहो लाख बार कह दूँ इसे क्या करूँँ कि दिल को नहीं ए'तिबार होता मिरी ख़ाक भी लहद में न रही 'अमीर' बाक़ी उन्हें मरने ही का अब तक नहीं ए'तिबार होता

Ameer Minai

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हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी क्यूँँ तुम आसान समझते थे मोहब्बत मेरी बअ'द मरने के भी छोड़ी न रिफ़ाक़त मेरी मेरी तुर्बत से लगी बैठी है हसरत मेरी मैं ने आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी खेंचा तो कहा पिस गई पिस गई बे-दर्द नज़ाकत मेरी आईना सुब्ह-ए-शब-ए-वस्ल जो देखा तो कहा देख ज़ालिम ये थी शाम को सूरत मेरी यार पहलू में है तन्हाई है कह दो निकले आज क्यूँँ दिल में छुपी बैठी है हसरत मेरी हुस्न और इश्क़ हम-आग़ोश नज़र आ जाते तेरी तस्वीर में खिंच जाती जो हैरत मेरी किस ढिटाई से वो दिल छीन के कहते हैं 'अमीर' वो मिरा घर है रहे जिस में मोहब्बत मेरी

Ameer Minai

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