ग़म-ए-दुनिया से गर पाई भी फ़ुर्सत सर उठाने की फ़लक का देखना तक़रीब तेरे याद आने की खुलेगा किस तरह मज़मूँ मिरे मक्तूब का या-रब क़सम खाई है उस काफ़िर ने काग़ज़ के जलाने की लिपटना पर्नियाँ में शोला-ए-आतिश का पिन्हाँ है वले मुश्किल है हिकमत दिल में सोज़-ए-ग़म छुपाने की उन्हें मंज़ूर अपने ज़ख़्मियों का देख आना था उठे थे सैर-ए-गुल को देखना शोख़ी बहाने की हमारी सादगी थी इल्तिफ़ात-ए-नाज़ पर मरना तिरा आना न था ज़ालिम मगर तम्हीद जाने की लकद कूब-ए-हवादिस का तहम्मुल कर नहीं सकती मिरी ताक़त कि ज़ामिन थी बुतों की नाज़ उठाने की कहूँ क्या ख़ूबी-ए-औज़ा-ए-अब्ना-ए-ज़माँ 'ग़ालिब' बदी की उस ने जिस से हम ने की थी बार-हा नेकी
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हर अँधेरा रौशनी में लग गया जिस को देखो शा'इरी में लग गया हम को मर जाने की फ़ुर्सत कब मिली वक़्त सारा ज़िन्दगी में लग गया अपना मैख़ाना बना सकते थे हम इतना पैसा मैकशी में लग गया ख़ुद से इतनी दूर जा निकले थे हम इक ज़माना वापसी में लग गया
Mehshar Afridi
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तुझे ना आएंगी मुफ़लिस की मुश्किलात समझ मैं छोटे लोगों के घर का बड़ा हूँ बात समझ मेरे इलावा हैं छे लोग मुनहसीर मुझ पर मेरी हर एक मुसीबत को जर्ब सात समझ दिल ओ दिमाग ज़रूरी हैं ज़िन्दगी के लिए ये हाथ पाऊँ इज़ाफ़ी सहूलियत समझ फ़लक से कट के ज़मीन पर गिरी पतंगें देख तू हिज्र काटने वालों की नफ़सियात समझ किताब-ए-इश्क़ में हर आह एक आयत है और आँसुओं को हुरूफ-ए-मुक़त्तेआत समझ
Umair Najmi
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मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा वो मुझ से जीत भी सकता था जाने क्यूँँ हारा बरस के खुल गए आँसू निथर गई है फ़ज़ा चमक रहा है सर-ए-शाम दर्द का तारा किसी की आँख से टपका था इक अमानत है मिरी हथेली पे रक्खा हुआ ये अँगारा जो पर समेटे तो इक शाख़ भी नहीं पाई खुले थे पर तो मिरा आसमान था सारा वो साँप छोड़ दे डसना ये मैं भी कहता हूँ मगर न छोड़ेंगे लोग उस को गर न फुन्कारा
Javed Akhtar
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सर उठाने की तो हिम्मत नहीं करने वाले ये जो मुर्दा हैं बग़ावत नहीं करने वाले मुफ़्लिसी लाख सही हम में वो ख़ुद्दारी है हाकिम-ए-वक़्त की ख़िदमत नहीं करने वाले इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले हाथ आँधी से मिला आए इसी दौर के लोग ये चराग़ों की हिफ़ाज़त नहीं करने वाले इश्क़ हम को ये निभाना है तो जो रख शर्तें हम किसी शर्त पे हुज्जत नहीं करने वाले फोड़ कर सर तिरे दर पर यहीं मर जाएँगे हम तिरे शहर से हिजरत नहीं करने वाले
Nadim Nadeem
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किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है वो सवाल जिस का जवाब है मेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है मैं बिछड़ के तुझ सेे बुलंदियों पे जो पस्त हूँ ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है
Abbas Qamar
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रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की
Mirza Ghalib
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हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़ दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़ न हो ब-हर्ज़ा बयाबाँ-नवर्द-ए-वहम-ए-वजूद हनूज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फ़राज़ विसाल जल्वा तमाशा है पर दिमाग़ कहाँ कि दीजे आइना-ए-इन्तिज़ार को पर्दाज़ हर एक ज़र्रा-ए-आशिक़ है आफ़ताब-परस्त गई न ख़ाक हुए पर हवा-ए-जल्वा-ए-नाज़ न पूछ वुसअत-ए-मय-ख़ाना-ए-जुनूँ 'ग़ालिब' जहाँ ये कासा-ए-गर्दूं है एक ख़ाक-अंदाज़ फ़रेब-ए-सनअत-ए-ईजाद का तमाशा देख निगाह अक्स-फ़रोश ओ ख़याल आइना-साज़ ज़ि-बस-कि जल्वा-ए-सय्याद हैरत-आरा है उड़ी है सफ़्हा-ए-ख़ातिर से सूरत-ए-परवाज़ हुजूम-ए-फ़िक्र से दिल मिस्ल-ए-मौज लरज़े है कि शीशा नाज़ुक ओ सहबा-ए-आबगीन-गुदाज़ 'असद' से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ वो मा'नी है कि खींचिए पर-ए-ताइर से सूरत-ए-परवाज़ हनूज़ ऐ असर-ए-दीद नंग-ए-रुस्वाई निगाह फ़ित्ना-ख़िराम ओ दर-ए-दो-आलम बाज़
Mirza Ghalib
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दिल मिरा सोज़-ए-निहाँ से बे-मुहाबा जल गया आतिश-ए-ख़ामोश की मानिंद गोया जल गया दिल में ज़ौक़-ए-वस्ल ओ याद-ए-यार तक बाक़ी नहीं आग इस घर में लगी ऐसी कि जो था जल गया मैं अदम से भी परे हूँ वर्ना ग़ाफ़िल बार-हा मेरी आह-ए-आतिशीं से बाल-ए-अन्क़ा जल गया अर्ज़ कीजे जौहर-ए-अंदेशा की गर्मी कहाँ कुछ ख़याल आया था वहशत का कि सहरा जल गया दिल नहीं तुझ को दिखाता वर्ना दाग़ों की बहार इस चराग़ाँ का करूँँ क्या कार-फ़रमा जल गया मैं हूँ और अफ़्सुर्दगी की आरज़ू 'ग़ालिब' कि दिल देख कर तर्ज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया ख़ानमान-ए-आशिक़ाँ दुकान-ए-आतिश-बाज़ है शो'ला-रू जब हो गए गर्म-ए-तमाशा जल गया ता कुजा अफ़सोस-ए-गरमी-हा-ए-सोहबत ऐ ख़याल दिल बा-सोज़-ए-आतिश-ए-दाग़-ए-तमन्ना जल गया है 'असद' बेगाना-ए-अफ़्सुर्दगी ऐ बेकसी दिल ज़-अंदाज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया दूद मेरा सुंबुलिस्ताँ से करे है हम-सरी बस-कि शौक़-ए-आतिश-गुल से सरापा जल गया शम्अ-रूयाँ की सर-अंगुश्त-ए-हिनाई देख कर ग़ुंचा-ए-गुल पर-फ़िशाँ परवाना-आसा जल गया
Mirza Ghalib
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हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या न हो मरना तो जीने का मज़ा क्या तजाहुल-पेशगी से मुद्दआ' क्या कहाँ तक ऐ सरापा नाज़ क्या क्या नवाज़िश-हा-ए-बेजा देखता हूँ शिकायत-हा-ए-रंगीं का गिला क्या निगाह-ए-बे-महाबा चाहता हूँ तग़ाफ़ुल-हा-ए-तमकीं-आज़मा क्या फ़रोग़-ए-शोला-ए-ख़स यक-नफ़स है हवस को पास-ए-नामूस-ए-वफ़ा क्या नफ़स मौज-ए-मुहीत-ए-बे-ख़ुदी है तग़ाफ़ुल-हा-ए-साक़ी का गिला क्या दिमाग़-ए-इत्र-ए-पैराहन नहीं है ग़म-ए-आवारगी-हा-ए-सबा क्या दिल-ए-हर-क़तरा है साज़-ए-अनल-बहर हम उस के हैं हमारा पूछना क्या मुहाबा क्या है मैं ज़ामिन इधर देख शहीदान-ए-निगह का ख़ूँ-बहा क्या सुन ऐ ग़ारत-गर-ए-जिंस-ए-वफ़ा सुन शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा क्या किया किस ने जिगर-दारी का दावा शकीब-ए-ख़ातिर-ए-आशिक़ भला क्या ये क़ातिल वादा-ए-सब्र-आज़मा क्यूँँ ये काफ़िर फ़ित्ना-ए-ताक़त-रुबा क्या बला-ए-जाँ है 'ग़ालिब' उस की हर बात इबारत क्या इशारत क्या अदा क्या
Mirza Ghalib
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चाहिए अच्छों को जितना चाहिए ये अगर चाहें तो फिर क्या चाहिए सोहबत-ए-रिंदाँ से वाजिब है हज़र जा-ए-मय अपने को खींचा चाहिए चाहने को तेरे क्या समझा था दिल बारे अब इस से भी समझा चाहिए चाक मत कर जैब बे-अय्याम-ए-गुल कुछ उधर का भी इशारा चाहिए दोस्ती का पर्दा है बेगानगी मुँह छुपाना हम से छोड़ा चाहिए दुश्मनी ने मेरी खोया ग़ैर को किस क़दर दुश्मन है देखा चाहिए अपनी रुस्वाई में क्या चलती है स'ई यार ही हंगामा-आरा चाहिए मुनहसिर मरने पे हो जिस की उमीद ना-उमीदी उस की देखा चाहिए ग़ाफ़िल इन मह-तलअ'तों के वास्ते चाहने वाला भी अच्छा चाहिए चाहते हैं ख़ूब-रूयों को 'असद' आप की सूरत तो देखा चाहिए
Mirza Ghalib
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