ghazalKuch Alfaaz

गिला नहीं है हमें अपनी जाँ-गुदाज़ी का जिगर पे ज़ख़्म है उस की ज़बाँ-दराज़ी का समंद-ए-नाज़ ने उस के जहाँ किया पामाल वही है अब भी उसे शौक़ तर्क ताज़ी का सितम हैं क़हर हैं लौंडे शराब-ख़ाने के उतार लेते हैं अमामा हर नमाज़ी का उलट-पलट मिरी आह-ए-सहर की क्या है कम अगर ख़याल तुम्हें होवे नेज़ा-बाज़ी का बताओ हम से कोई आन तुम से क्या बिगड़ी नहीं है तुम को सलीक़ा ज़माना-साज़ी का ख़ुदा को काम तो सौंपे हैं मैं ने सब लेकिन रहे है ख़ौफ़ मुझे वाँ की बे-नियाज़ी का चलो हो राह-ए-मुआफ़िक़ कहे मुख़ालिफ़ के तरीक़ छोड़ दिया तुम ने दिल-नवाज़ी का कसो की बात ने आगे मिरे न पाया रंग दिलों में नक़्श है मेरी सुख़न-तराज़ी का बसान-ए-ख़ाक हो पामाल राह-ए-ख़ल्क़ ऐ 'मीर' रखे है दिल में अगर क़स्द सरफ़राज़ी का

Related Ghazal

चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

105 likes

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

526 likes

नहीं था अपना मगर फिर भी अपना अपना लगा किसी से मिल के बहुत देर बा'द अच्छा लगा तुम्हें लगा था मैं मर जाऊँगा तुम्हारे बग़ैर बताओ फिर तुम्हें मेरा मज़ाक़ कैसा लगा तिजोरियों पे नज़र और लोग रखते हैं मैं आसमान चुरा लूँगा जब भी मौक़ा लगा दिखाती है भरी अलमारियाँ बड़े दिल से बताती है कि मोहब्बत में किस का कितना लगा

Tehzeeb Hafi

94 likes

ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

355 likes

More from Meer Taqi Meer

ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की

Meer Taqi Meer

0 likes

महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला

Meer Taqi Meer

0 likes

मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़ रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़ मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ'' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ

Meer Taqi Meer

0 likes

देखेगा जो तुझ रो को सो हैरान रहेगा वाबस्ता तिरे मू का परेशान रहेगा वा'दा तो किया इस से दम-ए-सुब्ह का लेकिन उस दम तईं मुझ में भी अगर जान रहेगा मुनइ'म ने बना ज़ुल्म की रख घर तो बनाया पर आप कोई रात ही मेहमान रहेगा छूटूँ कहीं ईज़ा से लगा एक ही जल्लाद ता-हश्र मिरे सर पे ये एहसान रहेगा चिमटे रहेंगे दश्त-ए-मोहब्बत में सर-ओ-तेग़ महशर तईं ख़ाली न ये मैदान रहेगा जाने का नहीं शोर सुख़न का मिरे हरगिज़ ता-हश्र जहाँ में मिरा दीवान रहेगा दिल देने की ऐसी हरकत उन ने नहीं की जब तक जियेगा 'मीर' पशेमान रहेगा

Meer Taqi Meer

0 likes

ख़ुश-क़दाँ जब सवार होते हैं सर्व-ओ-क़ुमरी शिकार होते हैं तेरे बालों के वस्फ़ में मेरे शे'र सब पेचदार होते हैं आओ याद-ए-बुताँ प भूल न जाओ ये तग़ाफ़ुल-शिआर होते हैं देख लेवेंगे ग़ैर को तुझ पास सोहबतों में भी यार होते हैं सदक़े हो लेवें एक-दम तेरे फिर तो तुझ पर निसार होते हैं तू करे है क़रार मिलने का हम अभी बे-क़रार होते हैं हफ़्त-इक़्लीम हर गली है कहीं दिल्ली से भी दयार होते हैं रफ़्ता रफ़्ता ये तिफ़्ल-ए-ख़ुश-ज़ाहिर फ़ित्ना-ए-रोज़गार होते हैं उस के नज़दीक कुछ नहीं इज़्ज़त 'मीर'-जी यूँँ ही ख़्वार होते हैं

Meer Taqi Meer

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Meer Taqi Meer.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Meer Taqi Meer's ghazal.