हाथ आए तो वही दामन-ए-जानाँ हो जाए छूट जाए तो वही अपना गरेबाँ हो जाए इश्क़ अब भी है वो महरम-ए-बे-गाना-नुमा हुस्न यूँँ लाख छुपे लाख नुमायाँ हो जाए होश-ओ-ग़फ़लत से बहुत दूर है कैफ़िय्यत-ए-इश्क़ उस की हर बे-ख़बरी मंज़िल-ए-इरफ़ाँ हो जाए याद आती है जब अपनी तो तड़प जाता हूँ मेरी हस्ती तिरा भूला हवा पैमाँ हो जाए आँख वो है जो तिरी जल्वा-गह-ए-नाज़ बने दिल वही है जो सरापा तिरा अरमाँ हो जाए पाक-बाज़ान-ए-मोहब्बत में जो बेबाकी है हुस्न गर उस को समझ ले तो पशेमाँ हो जाए सहल हो कर हुई दुश्वार मोहब्बत तेरी उसे मुश्किल जो बना लें तो कुछ आसाँ हो जाए इश्क़ फिर इश्क़ है जिस रूप में जिस भेस में हो इशरत-ए-वस्ल बने या ग़म-ए-हिज्राँ हो जाए कुछ मुदावा भी हो मजरूह दिलों का ऐ दोस्त मरहम-ए-ज़ख़्म तिरा जौर-पशेमाँ हो जाए ये भी सच है कोई उल्फ़त में परेशाँ क्यूँँ हो ये भी सच है कोई क्यूँँकर न परेशाँ हो जाए इश्क़ को अर्ज़-ए-तमन्ना में भी लाखों पस-ओ-पेश हुस्न के वास्ते इनकार भी आसाँ हो जाए झिलमिलाती है सर-ए-बज़्म-ए-जहाँ शम्अ-ए-ख़ुदी जो ये बुझ जाए चराग़-ए-रह-ए-इरफ़ाँ हो जाए सर-ए-शोरीदा दिया दश्त-ओ-बयाबाँ भी दिए ये मिरी ख़ूबी-ए-क़िस्मत कि वो ज़िंदाँ हो जाए उक़्दा-ए-इश्क़ अजब उक़्दा-ए-मोहमल है 'फ़िराक़' कभी ला-हल कभी मुश्किल कभी आसाँ हो जाए
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बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे
Kumar Vishwas
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इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दर-पेश हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है कि अचानक सुधर गया हूँ मैं
Jaun Elia
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दिल को तेरी ख़्वाहिश पहली बार हुई इस सहरा में बारिश पहली बार हुई माँगने वाले हीरे मोती माँगते हैं अश्कों की फ़रमाइश पहली बार हुई डूबने वाले इक इक कर के आ जाएँ दरिया में गुंजाइश पहली बार हुई
Abrar Kashif
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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बस्तियाँ ढूँढ़ रही हैं उन्हें वीरानों में वहशतें बढ़ गईं हद से तिरे दीवानों में निगह-ए-नाज़ न दीवानों न फ़र्ज़ानों में जानकार एक वही है मगर अन-जानों में बज़्म-ए-मय बे-ख़ुद-ओ-बे-ताब न क्यूँँ हो साक़ी मौज-ए-बादा है कि दर्द उठता है पैमानों में मैं तो मैं चौंक उठी है ये फ़ज़ा-ए-ख़ामोश ये सदा कब की सुनी आती है फिर कानों में सैर कर उजड़े दिलों की जो तबीअत है उदास जी बहल जाते हैं अक्सर इन्हीं वीरानों में वुसअतें भी हैं निहाँ तंगी-ए-दिल में ग़ाफ़िल जी बहल जाते हैं अक्सर इन्हीं मैदानों में जान ईमान-ए-जुनूँ सिलसिला जुम्बान-ए-जुनूँ कुछ कशिश-हा-ए-निहाँ जज़्ब हैं वीरानों में ख़ंदा-ए-सुब्ह-ए-अज़ल तीरगी-ए-शाम-ए-अबद दोनों आलम हैं छलकते हुए पैमानों में देख जब आलम-ए-हू को तो नया आलम है बस्तियाँ भी नज़र आने लगीं वीरानों में जिस जगह बैठ गए आग लगा कर उट्ठे गर्मियाँ हैं कुछ अभी सोख़्ता-सामानों में वहशतें भी नज़र आती हैं सर-ए-पर्दा-ए-नाज़ दामनों में है ये आलम न गरेबानों में एक रंगीनी-ए-ज़ाहिर है गुलिस्ताँ में अगर एक शादाबी-ए-पिन्हाँ है बयाबानों में जौहर-ए-ग़ुंचा-ओ-गुल में है इक अंदाज़-ए-जुनूँ कुछ बयाबाँ नज़र आए हैं गरेबानों में अब वो रंग-ए-चमन-ओ-ख़ंदा-ए-गुल भी न रहे अब वो आसार-ए-जुनूँ भी नहीं दीवानों में अब वो साक़ी की भी आँखें न रहीं रिंदों में अब वो साग़र भी छलकते नहीं मय-ख़ानों में अब वो इक सोज़-ए-निहानी भी दिलों में न रहा अब वो जल्वे भी नहीं इश्क़ के काशानों में अब न वो रात जब उम्मीदें भी कुछ थीं तुझ से अब न वो बात ग़म-ए-हिज्र के अफ़्सानों में अब तिरा काम है बस अहल-ए-वफ़ा का पाना अब तिरा नाम है बस इश्क़ के ग़म-ख़ानों में ता-ब-कै वादा-ए-मौहूम की तफ़्सील 'फ़िराक़' शब-ए-फ़ुर्क़त कहीं कटती है इन अफ़्सानों में
Firaq Gorakhpuri
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किसी का यूँँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी ये हुस्न ओ इश्क़ तो धोका है सब मगर फिर भी हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है नई नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी कहूँ ये कैसे इधर देख या न देख उधर कि दर्द दर्द है फिर भी नज़र नज़र फिर भी ख़ुशा इशारा-ए-पैहम ज़हे सुकूत-ए-नज़र दराज़ हो के फ़साना है मुख़्तसर फिर भी झपक रही हैं ज़मान ओ मकाँ की भी आँखें मगर है क़ाफ़िला आमादा-ए-सफ़र फिर भी शब-ए-फ़िराक़ से आगे है आज मेरी नज़र कि कट ही जाएगी ये शाम-ए-बे-सहर फिर भी कहीं यही तो नहीं काशिफ़-ए-हयात-ओ-ममात ये हुस्न ओ इश्क़ ब-ज़ाहिर हैं बे-ख़बर फिर भी पलट रहे हैं ग़रीब-उल-वतन पलटना था वो कूचा रू-कश-ए-जन्नत हो घर है घर फिर भी लुटा हुआ चमन-ए-इश्क़ है निगाहों को दिखा गया वही क्या क्या गुल ओ समर फिर भी ख़राब हो के भी सोचा किए तिरे महजूर यही कि तेरी नज़र है तिरी नज़र फिर भी हो बे-नियाज़-ए-असर भी कभी तिरी मिट्टी वो कीमिया ही सही रह गई कसर फिर भी लिपट गया तिरा दीवाना गरचे मंज़िल से उड़ी उड़ी सी है ये ख़ाक-ए-रहगुज़र फिर भी तिरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है उतर गया रग-ए-जाँ में ये नेश्तर फिर भी ग़म-ए-फ़िराक़ के कुश्तों का हश्र क्या होगा ये शाम-ए-हिज्र तो हो जाएगी सहर फिर भी फ़ना भी हो के गिराँ-बारी-ए-हयात न पूछ उठाए उठ नहीं सकता ये दर्द-ए-सर फिर भी सितम के रंग हैं हर इल्तिफ़ात-ए-पिन्हाँ में करम-नुमा हैं तिरे जौर सर-ब-सर फिर भी ख़ता मुआ'फ़ तिरा 'अफ़्व भी है मिस्ल-ए-सज़ा तिरी सज़ा में है इक शान-ए-दर-गुज़र फिर भी अगरचे बे-ख़ुदी-ए-इश्क़ को ज़माना हुआ 'फ़िराक़' करती रही काम वो नज़र फिर भी
Firaq Gorakhpuri
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दीदार में इक तुर्फ़ा दीदार नज़र आया हर बार छुपा कोई हर बार नज़र आया छालों को बयाबाँ भी गुलज़ार नज़र आया जब छेड़ पर आमादा हर ख़ार नज़र आया सुब्ह-ए-शब-ए-हिज्राँ की वो चाक-गरेबानी इक आलम-ए-नैरंगी हर तार नज़र आया हो सब्र कि बे-ताबी उम्मीद कि मायूसी नैरंग-ए-मोहब्बत भी बे-कार नज़र आया जब चश्म-ए-सियह तेरी थी छाई हुई दिल पर इस मुल्क का हर ख़ित्ता तातार नज़र आया तू ने भी तो देखी थी वो जाती हुई दुनिया क्या आख़िरी लम्हों में बीमार नज़र आया ग़श खा के गिरे मूसा अल्लाह-री मायूसी हल्का सा वो पर्दा भी दीवार नज़र आया ज़र्रा हो कि क़तरा हो ख़ुम-ख़ाना-ए-हस्ती में मख़मूर नज़र आया सरशार नज़र आया क्या कुछ न हुआ ग़म से क्या कुछ न किया ग़म ने और यूँँ तो हुआ जो कुछ बे-कार नज़र आया ऐ इश्क़ क़सम तुझ को मा'मूरा-ए-आलम की कोई ग़म-ए-फ़ुर्क़त में ग़म-ख़्वार नज़र आया शब कट गई फ़ुर्क़त की देखा न 'फ़िराक़' आख़िर तूल-ए-ग़म-ए-हिज्राँ भी बे-कार नज़र आया
Firaq Gorakhpuri
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'फ़िराक़' इक नई सूरत निकल तो सकती है ब-क़ौल उस आँख के दुनिया बदल तो सकती है तिरे ख़याल को कुछ चुप सी लग गई वर्ना कहानियों से शब-ए-ग़म बहल तो सकती है उरूस-ए-दहर चले खा के ठोकरें लेकिन क़दम क़दम पे जवानी उबल तो सकती है पलट पड़े न कहीं उस निगाह का जादू कि डूब कर ये छुरी कुछ उछल तो सकती है बुझे हुए नहीं इतने बुझे हुए दिल भी फ़सुर्दगी में तबीअ'त मचल तो सकती है अगर तू चाहे तो ग़म वाले शादमाँ हो जाएँ निगाह-ए-यार ये हसरत निकल तो सकती है अब इतनी बंद नहीं ग़म-कदों की भी राहें हवा-ए-कूच-ए-महबूब चल तो सकती है कड़े हैं कोस बहुत मंज़िल-ए-मोहब्बत के मिले न छाँव मगर धूप ढल तो सकती है हयात लौ तह-ए-दामान-ए-मर्ग दे उट्ठी हवा की राह में ये शम्अ' जल तो सकती है कुछ और मस्लहत-ए-जज़्ब-ए-इश्क़ है वर्ना किसी से छुट के तबीअ'त सँभल तो सकती है अज़ल से सोई है तक़दीर-ए-इश्क़ मौत की नींद अगर जगाइए करवट बदल तो सकती है ग़म-ए-ज़माना-ओ-सोज़-ए-निहाँ की आँच तो दे अगर न टूटे ये ज़ंजीर गल तो सकती है शरीक-ए-शर्म-ओ-हया कुछ है बद-गुमानी-ए-हुस्न नज़र उठा ये झिजक सी निकल तो सकती है कभी वो मिल न सकेगी मैं ये नहीं कहता वो आँख आँख में पड़ कर बदल तो सकती है बदलता जाए ग़म-ए-रोज़गार का मरकज़ ये चाल गर्दिश-ए-अय्याम चल तो सकती है वो बे-नियाज़ सही दिल मता-ए-हेच सही मगर किसी की जवानी मचल तो सकती है तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और कि गिरते गिरते भी दुनिया सँभल तो सकती है ये ज़ोर-ओ-शोर सलामत तिरी जवानी भी ब-क़ौल इश्क़ के साँचे में ढल तो सकती है सुना है बर्फ़ के टुकड़े हैं दिल हसीनों के कुछ आँच पा के ये चाँदी पिघल तो सकती है हँसी हँसी में लहू थूकते हैं दिल वाले ये सर-ज़मीन मगर ला'ल उगल तो सकती है जो तू ने तर्क-ए-मोहब्बत को अहल-ए-दिल से कहा हज़ार नर्म हो ये बात खल तो सकती है अरे वो मौत हो या ज़िंदगी मोहब्बत पर न कुछ सही कफ़-ए-अफ़सोस मल तो सकती है हैं जिस के बल पे खड़े सरकशों को वो धरती अगर कुचल नहीं सकती निगल तो सकती है हुई है गर्म लहू पी के इश्क़ की तलवार यूँँ ही जिलाए जा ये शाख़ फल तो सकती है गुज़र रही है दबे पाँव इश्क़ की देवी सुबुक-रवी से जहाँ को मसल तो सकती है हयात से निगह-ए-वापसीं है कुछ मानूस मिरे ख़याल से आँखों में पल तो सकती है न भूलना ये है ताख़ीर हुस्न की ताख़ीर 'फ़िराक़' आई हुई मौत टल तो सकती है
Firaq Gorakhpuri
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वक़्त-ए-ग़ुरूब आज करामात हो गई ज़ुल्फ़ों को उस ने खोल दिया रात हो गई कल तक तो उस में ऐसी करामत न थी कोई वो आँख आज क़िबला-ए-हाजात हो गई ऐ सोज़-ए-इश्क़ तू ने मुझे क्या बना दिया मेरी हर एक साँस मुनाजात हो गई ओछी निगाह डाल के इक सम्त रख दिया दिल क्या दिया ग़रीब की सौग़ात हो गई कुछ याद आ गई थी वो ज़ुल्फ़-ए-शिकन-शिकन हस्ती तमाम चश्मा-ए-ज़ुल्मात हो गई अहल-ए-वतन से दूर जुदाई में यार की सब्र आ गया 'फ़िराक़' करामात हो गई
Firaq Gorakhpuri
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