ghazalKuch Alfaaz

हैरान न हो देख मैं क्या देख रहा हूँ बंदे तिरी सूरत में ख़ुदा देख रहा हूँ वो अपनी जफ़ाओं का असर देख रहे हैं मैं मअनी-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा देख रहा हूँ दुज़्दीदा निगाहों से किधर देख रहे हो क्या बात है! ये आज मैं क्या देख रहा हूँ है हुस्न यही शय तो गुमाँ और न कीजे सौदा नहीं मतलूब ज़रा देख रहा हूँ किस तरह न क़ाइल हूँ दुआ-ए-सहरी का उस लब पे तबस्सुम की ज़िया देख रहा हूँ क्यूँँ अर्ज़-ए-वतन तंग है ये बात ही क्या है अब तो फ़क़त इक क़ब्र की जा देख रहा हूँ मर जाने की धमकी हुई तम्हीद-ए-तमाशा मैं ने कहा देख उस ने कहा देख रहा हूँ

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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मिटने वाली हसरतें ईजाद कर लेता हूँ मैं जब भी चाहूँ इक जहाँ आबाद कर लेता हूँ मैं मुझ को इन मजबूरियों पर भी है इतना इख़्तियार आह भर लेता हूँ मैं फ़रियाद कर लेता हूँ मैं हुस्न बे-चारा तो हो जाता है अक्सर मेहरबाँ फिर उसे आमादा-ए-बे-दाद कर लेता हूँ मैं तू नहीं कहता मगर देख ओ वफ़ा-ना-आश्ना अपनी हस्ती किस क़दर बर्बाद कर लेता हूँ मैं हाँ ये वीराना ये दिल ये आरज़ूओं का मज़ार तुम कहो तो फिर इसे आबाद कर लेता हूँ मैं जब कोई ताज़ा मुसीबत टूटती है ऐ 'हफ़ीज़' एक आदत है ख़ुदा को याद कर लेता हूँ मैं

Hafeez Jalandhari

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ये मुलाक़ात मुलाक़ात नहीं होती है बात होती है मगर बात नहीं होती है बारयाबी का बुरा हो कि अब उन के दर पर अगले वक़्तों की मुदारात नहीं होती है ग़म तो घनघोर घटाओं की तरह उठते हैं ज़ब्त का दश्त है बरसात नहीं होती है ये मिरा तजरबा है हुस्न कोई चाल चले बाज़ी-ए-इश्क़ कभी मात नहीं होती है वस्ल है नाम हम-आहंगी ओ यक-रंगी का वस्ल में कोई बुरी बात नहीं होती है हिज्र तंहाई है सूरज है सवा नेज़े पर दिन ही रहता है यहाँ रात नहीं होती है ज़ब्त-ए-गिर्या कभी करता हूँ तो फ़रमाते हैं आज क्या बात है बरसात नहीं होती है मुझे अल्लाह की क़सम शे'र में तहसीन-ए-बुताँ मैं जो करता हूँ मेरी ज़ात नहीं होती है फ़िक्र-ए-तख़्लीक़-ए-सुख़न मसनद-ए-राहत पे हफ़ीज़ बाइस-ए-कश्फ़-ओ-करामात नहीं होती है

Hafeez Jalandhari

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कोई दवा न दे सके मशवरा-ए-दुआ दिया चारागरों ने और भी दर्द दिल का बढ़ा दिया दोनों को दे के सूरतें साथ ही आइना दिया इश्क़ बिसोरने लगा हुस्न ने मुस्कुरा दिया ज़ौक़-ए-निगाह के सिवा शौक़-ए-गुनाह के सिवा मुझ को बुतों से क्या मिला मुझ को ख़ुदा ने क्या दिया थी न ख़िज़ाँ की रोक-थाम दामन-ए-इख़्तियार में हम ने भरी बहार में अपना चमन लुटा दिया हुस्न-ए-नज़र की आबरू सनअत-ए-बरहमन से है जिस को सनम बना लिया उस को ख़ुदा बना दिया दाग़ है मुझ पे इश्क़ का मेरा गुनाह भी तो देख उस की निगाह भी तो देख जिस ने ये गुल खिला दिया इश्क़ की मम्लिकत में है शोरिश-ए-अक़्ल-ए-ना-मुराद उभरा कहीं जो ये फ़साद दिल ने वहीं दबा दिया नक़्श-ए-वफ़ा तो मैं ही था अब मुझे ढूँडते हो क्या हर्फ़-ए-ग़लत नज़र पड़ा तुम ने मुझे मिटा दिया ख़ुब्स-ए-दरूँ दिखा दिया हर दहन-ए-ग़लीज़ ने कुछ न कहा 'हफ़ीज़' ने हँस दिया मुस्कुरा दिया

Hafeez Jalandhari

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दोस्ती का चलन रहा ही नहीं अब ज़माने की वो हवा ही नहीं सच तो ये है सनम-कदे वालो दिल ख़ुदा ने तुम्हें दिया ही नहीं पलट आने से हो गया साबित नामा-बर तू वहाँ गया ही नहीं हाल ये है कि हम ग़रीबों का हाल तुम ने कभी सुना ही नहीं क्या चले ज़ोर दश्त-ए-वहशत का हम ने दामन कभी सिया ही नहीं ग़ैर भी एक दिन मरेंगे ज़रूर उन के हिस्से में क्या क़ज़ा ही नहीं उस की सूरत को देखता हूँ मैं मेरी सीरत वो देखता ही नहीं इश्क़ मेरा है शहर में मशहूर और तुम ने अभी सुना ही नहीं क़िस्सा-ए-क़ैस सुन के फ़रमाया झूट की कोई इंतिहा ही नहीं वास्ता किस का दें 'हफ़ीज़' उन को उन बुतों का कोई ख़ुदा ही नहीं

Hafeez Jalandhari

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हुस्न ने सीखीं ग़रीब-आज़ारियाँ इश्क़ की मजबूरियाँ लाचारियाँ बह गया दिल हसरतों के ख़ून में ले गईं बीमार को बीमारियाँ सोच कर ग़म दीजिए ऐसा न हो आप को करनी पड़ें ग़म-ख़्वारियाँ दार के क़दमों में भी पहुँची न अक़्ल इश्क़ ही के सर रहीं सरदारियाँ इक तरफ़ जिंस-ए-वफ़ा क़ीमत-तबल इक तरफ़ मैं और मिरी नादारियाँ होते होते जान दूभर हो गई बढ़ते बढ़ते बढ़ गईं बे-ज़ारियाँ तुम ने दुनिया ही बदल डाली मिरी अब तो रहने दो ये दुनिया-दारियाँ

Hafeez Jalandhari

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