ghazalKuch Alfaaz

हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए काफ़िरों की नमाज़ हो जाए दिल रहीन-ए-नियाज़ हो जाए बेकसी कारसाज़ हो जाए मिन्नत-ए-चारा-साज़ कौन करे दर्द जब जाँ-नवाज़ हो जाए इश्क़ दिल में रहे तो रुस्वा हो लब पे आए तो राज़ हो जाए लुत्फ़ का इंतिज़ार करता हूँ जौर ता हद्द-ए-नाज़ हो जाए उम्र बे-सूद कट रही है 'फ़ैज़' काश इफ़शा-ए-राज़ हो जाए

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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी

Zubair Ali Tabish

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दर-पेश हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है कि अचानक सुधर गया हूँ मैं

Jaun Elia

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तेरा चेहरा तेरे होंठ और पलकें देखें दिल पे आँखें रक्खे तेरी साँसें देखें मेरे मालिक आप तो ऐसा कर सकते हैं साथ चले हम और दुनिया की आँखें देखें साल होने को आया है वो कब लौटेगा आओ खेत की सैर को निकले कुंजें देखें हम तेरे होंठों को लरजिश कब भूलें हैं पानी में पत्थर फेंकें और लहरें देखें

Tehzeeb Hafi

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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

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दरबार में अब सतवत-ए-शाही की अलामत दरबाँ का असा है कि मुसन्निफ़ का क़लम है आवारा है फिर कोह-ए-निदा पर जो बशारत तम्हीद-ए-मसर्रत है कि तूल-ए-शब-ए-ग़म है जिस धज्जी को गलियों में लिए फिरते हैं तिफ़्लाँ ये मेरा गरेबाँ है कि लश्कर का अलम है जिस नूर से है शहर की दीवार दरख़्शाँ ये ख़ून-ए-शहीदाँ है कि ज़र-ख़ाना-ए-जम है हल्क़ा किए बैठे रहो इक शम्अ' को यारो कुछ रौशनी बाक़ी तो है हर-चंद कि कम है

Faiz Ahmad Faiz

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गर्मी-ऐ-शौक़-ऐ-नज़ारा का असर तो देखो गुल खिले जाते हैं वो साया-ए-तर तो देखो ऐसे नादाँ भी न थे जाँ से गुज़रने वाले नासेहो पंद-गरो राह-गुज़र तो देखो वो तो वो है तुम्हें हो जाएगी उल्फ़त मुझ से इक नज़र तुम मिरा महबूब-ए-नज़र तो देखो वो जो अब चाक गरेबाँ भी नहीं करते हैं देखने वालो कभी उन का जिगर तो देखो दामन-ए-दर्द को गुलज़ार बना रक्खा है आओ इक दिन दिल-ए-पुर-ख़ूँ का हुनर तो देखो सुब्ह की तरह झमकता है शब-ए-ग़म का उफ़ुक़ 'फ़ैज़' ताबिंदगी-ए-दीदा-ए-तर तो देखो

Faiz Ahmad Faiz

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रह-ए-ख़िज़ाँ में तलाश-ए-बहार करते रहे शब-ए-सियह से तलब हुस्न-ए-यार करते रहे ख़याल-ए-यार कभी ज़िक्र-ए-यार करते रहे इसी मताअ' पे हम रोज़गार करते रहे नहीं शिकायत-ए-हिज्राँ कि इस वसीले से हम उन से रिश्ता-ए-दिल उस्तुवार करते रहे वो दिन कि कोई भी जब वज्ह-ए-इन्तिज़ार न थी हम उन में तेरा सिवा इंतिज़ार करते रहे हम अपने राज़ पे नाज़ाँ थे शर्मसार न थे हर एक से सुख़न-ए-राज़-दार करते रहे ज़िया-ए-बज़्म-ए-जहाँ बार बार मांद हुई हदीस-ए-शोला-रुख़ाँ बार बार करते रहे उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है जो गाह गाह जुनूँ इख़्तियार करते रहे

Faiz Ahmad Faiz

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आप की याद आती रही रात भर चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर गाह जलती हुई गाह बुझती हुई शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन कोई तस्वीर गाती रही रात भर फिर सबा साया-ए-शाख़-ए-गुल के तले कोई क़िस्सा सुनाती रही रात भर जो न आया उसे कोई ज़ंजीर-ए-दर हर सदा पर बुलाती रही रात भर एक उम्मीद से दिल बहलता रहा इक तमन्ना सताती रही रात भर

Faiz Ahmad Faiz

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कब याद में तेरा साथ नहीं कब हात में तेरा हात नहीं सद-शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँ दिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है ये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं मैदान-ए-वफ़ा दरबार नहीं याँ नाम-ओ-नसब की पूछ कहाँ आशिक़ तो किसी का नाम नहीं कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहीं गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं

Faiz Ahmad Faiz

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