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हम उन को छीन कर लाए हैं कितने दावेदारों से शफ़क़ से चाँदनी-रातों से फूलों से सितारों से हमारे ज़ख़्म-ए-दिल दाग़-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं गुलों से गुल-रुख़ों से महवशों से माह-पारों से ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है गुफाओं से पहाड़ों से बयाबानों से ग़ारों से बराबर एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है कुओं से पन-घटों से नद्दियों से आबशारों से कभी पत्थर के दिल ऐ 'कैफ़' पिघले हैं न पिघलेंगे मुनाजातों से फ़रियादों से चीख़ों से पुकारों से

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे

Kumar Vishwas

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बरसों पुराना दोस्त मिला जैसे ग़ैर हो देखा रुका झिझक के कहा तुम उमैर हो मिलते हैं मुश्किलों से यहाँ हम-ख़याल लोग तेरे तमाम चाहने वालों की ख़ैर हो कमरे में सिगरेटों का धुआँ और तेरी महक जैसे शदीद धुंध में बाग़ों की सैर हो हम मुत्मइन बहुत हैं अगर ख़ुश नहीं भी हैं तुम ख़ुश हो क्या हुआ जो हमारे बग़ैर हो पैरों में उस के सर को धरें इल्तिजा करें इक इल्तिजा कि जिस का न सर हो न पैर हो

Umair Najmi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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सलाम उस पर अगर ऐसा कोई फ़नकार हो जाए सियाही ख़ून बन जाए क़लम तलवार हो जाए ज़माने से कहो कुछ साइक़ा-रफ़्तार हो जाए हमारे साथ चलने के लिए तय्यार हो जाए ज़माने को तमन्ना है तिरा दीदार करने की मुझे ये फ़िक्र है मुझ को मिरा दीदार हो जाए वो ज़ुल्फ़ें साँप हैं बे-शक अगर ज़ंजीर बन जाएँ मोहब्बत ज़हर है बे-शक अगर आज़ार हो जाए मोहब्बत से तुम्हें सरकार कहते हैं वगरना हम निगाहें डाल दें जिस पर वही सरकार हो जाए

Kaif Bhopali

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हाए लोगों की करम-फ़रमाइयाँ तोहमतें बदनामियाँ रुस्वाइयाँ ज़िंदगी शायद इसी का नाम है दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ क्या ज़माने में यूँँ ही कटती है रात करवटें बेताबियाँ अंगड़ाइयाँ क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार आहटें घबराहटें परछाइयाँ एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में हैं शाहियाँ सुलतानियाँ दाराइयाँ एक पैकर में सिमट कर रह गईं ख़ूबियाँ ज़ेबाइयाँ रानाइयाँ रह गईं इक तिफ़्ल-ए-मकतब के हुज़ूर हिकमतें आगाहियाँ दानाइयाँ ज़ख़्म दिल के फिर हरे करने लगीं बदलियाँ बरखा रुतें पुरवाइयाँ दीदा-ओ-दानिस्ता उन के सामने लग़्ज़िशें नाकामियाँ पसपाइयाँ मेरे दिल की धड़कनों में ढल गईं चूड़ियाँ मौसीक़ियाँ शहनाइयाँ उन से मिल कर और भी कुछ बढ़ गईं उलझनें फ़िक्रें क़यास-आराइयाँ 'कैफ़' पैदा कर समुंदर की तरह वुसअतें ख़ामोशियाँ गहराइयाँ

Kaif Bhopali

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तुम से न मिल के ख़ुश हैं वो दावा किधर गया  दो रोज़ में गुलाब सा चेहरा उतर गया  जान-ए-बहार तुम ने वो काँटे चुभोए हैं  मैं हर गुल-ए-शगुफ़्ता को छूने से डर गया  इस दिल के टूटने का मुझे कोई ग़म नहीं  अच्छा हुआ कि पाप कटा दर्द-ए-सर गया  मैं भी समझ रहा हूँ कि तुम तुम नहीं रहे  तुम भी ये सोच लो कि मिरा 'कैफ़' मर गया

Kaif Bhopali

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ख़ानक़ाह में सूफ़ी मुँह छुपाए बैठा है ग़ालिबन ज़माने से मात खाए बैठा है क़त्ल तो नहीं बदला क़त्ल की अदा बदली तीर की जगह क़ातिल साज़ उठाए बैठा है उन के चाहने वाले धूप धूप फिरते हैं ग़ैर उन के कूचे में साए साए बैठा है वाए आशिक़-ए-नादाँ काएनात ये तेरी इक शिकस्ता शीशे को दिल बनाए बैठा है दूर बारिश ऐ गुलचीं वा है दीदा-ए-नर्गिस आज हर गुल-ए-नर्गिस ख़ार खाए बैठा है

Kaif Bhopali

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तन-ए-तन्हा मुक़ाबिल हो रहा हूँ मैं हज़ारों से हसीनों से रक़ीबों से ग़मों से ग़म-गुसारों से उन्हें मैं छीन कर लाया हूँ कितने दावेदारों से शफ़क़ से चाँदनी रातों से फूलों से सितारों से सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है पहाड़ों से गुफाओं से बयाबानों से ग़ारों से हमारे दाग़-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं गुलों से गुल-रुख़ों से मह-वशों से माह-पारों से कभी होता नहीं महसूस वो यूँँ क़त्ल करते हैं निगाहों से कनखियों से अदाओं से इशारों से हमेशा एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है कुओं से पनघटों से नद्दियों से आबशारों से न आए पर न आए वो उन्हें क्या क्या ख़बर भेजी लिफ़ाफ़ों से ख़तों से दुख भरे पर्चों से तारों से ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से वो दिन भी हाए क्या दिन थे जब अपना भी तअ'ल्लुक़ था दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से कभी पत्थर के दिल ऐ 'कैफ़' पिघले हैं न पिघलेंगे मुनाजातों से फ़रियादों से चीख़ों से पुकारों से

Kaif Bhopali

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