जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया परछाईं ज़िंदा रह गई इंसान मर गया बर्बादियाँ तो मेरा मुक़द्दर ही थीं मगर चेहरों से दोस्तों के मुलम्मा उतर गया ऐ दोपहर की धूप बता क्या जवाब दूँ दीवार पूछती है कि साया किधर गया इस शहर में फ़राश-तलब है हर एक राह वो ख़ुश-नसीब था जो सलीक़े से मर गया क्या क्या न उस को ज़ोम-ए-मसीहाई था 'उमीद' हम ने दिखाए ज़ख़्म तो चेहरा उतर गया
Related Ghazal
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
249 likes
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
196 likes
ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
190 likes
More from Ummeed Fazli
अक़्ल ने हम को यूँँ भटकाया रह न सके दीवाने भी आबादी को ढूँडने निकले खो बैठे वीराने भी चश्म-ए-साक़ी भी नम है लौ देते हैं पैमाने भी तिश्ना-लबी के सैल-ए-तपाँ से बच न सके मयख़ाने भी संग-ए-जफ़ा को ख़ुश-ख़बरी दो मुज़्दा दो ज़ंजीरों को शहर-ए-ख़िरद में आ पहुँचे हैं हम जैसे दीवाने भी हम ने जब जिस दोस्त को भी आईना दिखाया माज़ी का हैराँ हो कर अक्स ने पूछा आप मुझे पहचाने भी जिस्म की तिश्ना-सामानी से जिस्म ही ना-आसूदा नहीं टूट गए इस ज़द पर आ कर रूह के ताने-बाने भी अंदेशे और बज़्म-ए-जानाँ दार का ज़िक्र और इतना सुकूत दीवानों के भेस में शायद आ पहुँचे फ़रज़ाने भी
Ummeed Fazli
0 likes
मक़्तल-ए-जाँ से कि ज़िंदाँ से कि घर से निकले हम तो ख़ुशबू की तरह निकले जिधर से निकले गर क़यामत ये नहीं है तो क़यामत क्या है शहर जलता रहा और लोग न घर से निकले जाने वो कौन सी मंज़िल थी मोहब्बत की जहाँ मेरे आँसू भी तिरे दीदा-ए-तर से निकले दर-ब-दरी का हमें तअना न दे ऐ चश्म-ए-ग़ज़ाल देख वो ख़्वाब कि जिस के लिए घर से निकले मेरा रहज़न हुआ क्या क्या न पशेमान कि जब इस के ना में मेरे असबाब-ए-सफ़र से निकले बर-सर-ए-दोश रहे या सर-ए-नेज़ा या-रब हक़-परस्ती का न सौदा कभी सर से निकले
Ummeed Fazli
0 likes
वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है बिछड़ने वाला शरीक-ए-सफ़र तो अब भी है ज़बाँ बुरीदा सही मैं ख़िज़ाँ-गज़ीदा सही हरा-भरा मिरा ज़ख़्म-ए-हुनर तो अब भी है सुना था हम ने कि मौसम बदल गए हैं मगर ज़मीं से फ़ासला-ए-अब्र-ए-तर तो अब भी है हमारी दर-बदरी पर न जाइए कि हमें शुऊर-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर तो अब भी है हवस के दौर में मम्नून-ए-याद-ए-यार हैं हम कि याद-ए-यार दिलों की सिपर तो अब भी है कहानियाँ हैं अगर मो'तबर तो फिर इक शख़्स कहानियों की तरह मो'तबर तो अब भी है हज़ार खींच ले सूरज हिसार-ए-अब्र मगर किरन किरन पे गिरफ़्त-ए-नज़र तो अब भी है समुंदरों से ज़मीनों को ख़ौफ़ क्या कि उमीद नुमू-पज़ीर ज़मीन-ए-हुनर तो अब भी है मगर ये कौन बदलती हुई रुतों से कहे शजर में साया नहीं है शजर तो अब भी है
Ummeed Fazli
0 likes
कब तक इस प्यास के सहरा में झुलसते जाएँ अब ये बादल जो उठे हैं तो बरसते जाएँ कौन बतलाए तुम्हें कैसे वो मौसम हैं कि जो मुझ से ही दूर रहें मुझ में ही बस्ते जाएँ हम से आज़ाद-मिज़ाजों पे ये उफ़्ताद है क्या चाहते जाएँ उसे ख़ुद को तरसते जाएँ हाए क्या लोग ये आबाद हुए हैं मुझ में प्यार के लफ़्ज़ लिखें लहजे से डसते जाएँ आइना देखूँ तो इक चेहरे के बे-रंग नुक़ूश एक नादीदा सी ज़ंजीर में कसते जाएँ जुज़ मोहब्बत किसे आया है मुयस्सर 'उम्मीद' ऐसा लम्हा कि जिधर सदियों के रस्ते जाएँ
Ummeed Fazli
0 likes
इक ऐसा मरहला-ए-रह-गुज़र भी आता है कोई फ़सील-ए-अना से उतर भी आता है तिरी तलाश में जाने कहाँ भटक जाऊँ सफ़र में दश्त भी आता है घर भी आता है तलाश साए की लाई जो दश्त से तो खुला अज़ाब-ए-सूरत-ए-दीवार-ओ-दर भी आता है सकूँ तो जब हो कि मैं छाँव सेहन में देखूँ नज़र तो वैसे गली का शजर भी आता है बदन की ख़ाक समेटे हुए हो क्या लोगों सफ़र में लम्हा-ए-तर्क-ए-सफ़र भी आता है दिलों को ज़ख़्म न दो हर्फ़-ए-ना-मुलाएम से ये तीर वो है कि जो लौट कर भी आता है मैं शहर में किसे इल्ज़ाम-ए-ना-शनासी दूँ ये हर्फ़ ख़ुद मिरे किरदार पर भी आता है नज़र ये किस से मिली ना-गहाँ कि याद आया इसी गली में कहीं मेरा घर भी आता है हवा के रुख़ पे नज़र ताइरान-ए-ख़ुश-परवाज़ क़फ़स का साया पस-ए-बाल-ओ-पर भी आता है मैं हर्फ़ हर्फ़ में उतरा हूँ रौशनी की तरह सो काएनात का चेहरा नज़र भी आता है लहू से हर्फ़ तराशें जो मेरी तरह उम्मीद उन्हीं के हिस्से में ज़ख़्म-ए-हुनर भी आता है
Ummeed Fazli
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Ummeed Fazli.
Similar Moods
More moods that pair well with Ummeed Fazli's ghazal.







