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जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया परछाईं ज़िंदा रह गई इंसान मर गया बर्बादियाँ तो मेरा मुक़द्दर ही थीं मगर चेहरों से दोस्तों के मुलम्मा उतर गया ऐ दोपहर की धूप बता क्या जवाब दूँ दीवार पूछती है कि साया किधर गया इस शहर में फ़राश-तलब है हर एक राह वो ख़ुश-नसीब था जो सलीक़े से मर गया क्या क्या न उस को ज़ोम-ए-मसीहाई था 'उमीद' हम ने दिखाए ज़ख़्म तो चेहरा उतर गया

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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अक़्ल ने हम को यूँँ भटकाया रह न सके दीवाने भी आबादी को ढूँडने निकले खो बैठे वीराने भी चश्म-ए-साक़ी भी नम है लौ देते हैं पैमाने भी तिश्ना-लबी के सैल-ए-तपाँ से बच न सके मयख़ाने भी संग-ए-जफ़ा को ख़ुश-ख़बरी दो मुज़्दा दो ज़ंजीरों को शहर-ए-ख़िरद में आ पहुँचे हैं हम जैसे दीवाने भी हम ने जब जिस दोस्त को भी आईना दिखाया माज़ी का हैराँ हो कर अक्स ने पूछा आप मुझे पहचाने भी जिस्म की तिश्ना-सामानी से जिस्म ही ना-आसूदा नहीं टूट गए इस ज़द पर आ कर रूह के ताने-बाने भी अंदेशे और बज़्म-ए-जानाँ दार का ज़िक्र और इतना सुकूत दीवानों के भेस में शायद आ पहुँचे फ़रज़ाने भी

Ummeed Fazli

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मक़्तल-ए-जाँ से कि ज़िंदाँ से कि घर से निकले हम तो ख़ुशबू की तरह निकले जिधर से निकले गर क़यामत ये नहीं है तो क़यामत क्या है शहर जलता रहा और लोग न घर से निकले जाने वो कौन सी मंज़िल थी मोहब्बत की जहाँ मेरे आँसू भी तिरे दीदा-ए-तर से निकले दर-ब-दरी का हमें तअना न दे ऐ चश्म-ए-ग़ज़ाल देख वो ख़्वाब कि जिस के लिए घर से निकले मेरा रहज़न हुआ क्या क्या न पशेमान कि जब इस के ना में मेरे असबाब-ए-सफ़र से निकले बर-सर-ए-दोश रहे या सर-ए-नेज़ा या-रब हक़-परस्ती का न सौदा कभी सर से निकले

Ummeed Fazli

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वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है बिछड़ने वाला शरीक-ए-सफ़र तो अब भी है ज़बाँ बुरीदा सही मैं ख़िज़ाँ-गज़ीदा सही हरा-भरा मिरा ज़ख़्म-ए-हुनर तो अब भी है सुना था हम ने कि मौसम बदल गए हैं मगर ज़मीं से फ़ासला-ए-अब्र-ए-तर तो अब भी है हमारी दर-बदरी पर न जाइए कि हमें शुऊर-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर तो अब भी है हवस के दौर में मम्नून-ए-याद-ए-यार हैं हम कि याद-ए-यार दिलों की सिपर तो अब भी है कहानियाँ हैं अगर मो'तबर तो फिर इक शख़्स कहानियों की तरह मो'तबर तो अब भी है हज़ार खींच ले सूरज हिसार-ए-अब्र मगर किरन किरन पे गिरफ़्त-ए-नज़र तो अब भी है समुंदरों से ज़मीनों को ख़ौफ़ क्या कि उमीद नुमू-पज़ीर ज़मीन-ए-हुनर तो अब भी है मगर ये कौन बदलती हुई रुतों से कहे शजर में साया नहीं है शजर तो अब भी है

Ummeed Fazli

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कब तक इस प्यास के सहरा में झुलसते जाएँ अब ये बादल जो उठे हैं तो बरसते जाएँ कौन बतलाए तुम्हें कैसे वो मौसम हैं कि जो मुझ से ही दूर रहें मुझ में ही बस्ते जाएँ हम से आज़ाद-मिज़ाजों पे ये उफ़्ताद है क्या चाहते जाएँ उसे ख़ुद को तरसते जाएँ हाए क्या लोग ये आबाद हुए हैं मुझ में प्यार के लफ़्ज़ लिखें लहजे से डसते जाएँ आइना देखूँ तो इक चेहरे के बे-रंग नुक़ूश एक नादीदा सी ज़ंजीर में कसते जाएँ जुज़ मोहब्बत किसे आया है मुयस्सर 'उम्मीद' ऐसा लम्हा कि जिधर सदियों के रस्ते जाएँ

Ummeed Fazli

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इक ऐसा मरहला-ए-रह-गुज़र भी आता है कोई फ़सील-ए-अना से उतर भी आता है तिरी तलाश में जाने कहाँ भटक जाऊँ सफ़र में दश्त भी आता है घर भी आता है तलाश साए की लाई जो दश्त से तो खुला अज़ाब-ए-सूरत-ए-दीवार-ओ-दर भी आता है सकूँ तो जब हो कि मैं छाँव सेहन में देखूँ नज़र तो वैसे गली का शजर भी आता है बदन की ख़ाक समेटे हुए हो क्या लोगों सफ़र में लम्हा-ए-तर्क-ए-सफ़र भी आता है दिलों को ज़ख़्म न दो हर्फ़-ए-ना-मुलाएम से ये तीर वो है कि जो लौट कर भी आता है मैं शहर में किसे इल्ज़ाम-ए-ना-शनासी दूँ ये हर्फ़ ख़ुद मिरे किरदार पर भी आता है नज़र ये किस से मिली ना-गहाँ कि याद आया इसी गली में कहीं मेरा घर भी आता है हवा के रुख़ पे नज़र ताइरान-ए-ख़ुश-परवाज़ क़फ़स का साया पस-ए-बाल-ओ-पर भी आता है मैं हर्फ़ हर्फ़ में उतरा हूँ रौशनी की तरह सो काएनात का चेहरा नज़र भी आता है लहू से हर्फ़ तराशें जो मेरी तरह उम्मीद उन्हीं के हिस्से में ज़ख़्म-ए-हुनर भी आता है

Ummeed Fazli

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