वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है बिछड़ने वाला शरीक-ए-सफ़र तो अब भी है ज़बाँ बुरीदा सही मैं ख़िज़ाँ-गज़ीदा सही हरा-भरा मिरा ज़ख़्म-ए-हुनर तो अब भी है सुना था हम ने कि मौसम बदल गए हैं मगर ज़मीं से फ़ासला-ए-अब्र-ए-तर तो अब भी है हमारी दर-बदरी पर न जाइए कि हमें शुऊर-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर तो अब भी है हवस के दौर में मम्नून-ए-याद-ए-यार हैं हम कि याद-ए-यार दिलों की सिपर तो अब भी है कहानियाँ हैं अगर मो'तबर तो फिर इक शख़्स कहानियों की तरह मो'तबर तो अब भी है हज़ार खींच ले सूरज हिसार-ए-अब्र मगर किरन किरन पे गिरफ़्त-ए-नज़र तो अब भी है समुंदरों से ज़मीनों को ख़ौफ़ क्या कि उमीद नुमू-पज़ीर ज़मीन-ए-हुनर तो अब भी है मगर ये कौन बदलती हुई रुतों से कहे शजर में साया नहीं है शजर तो अब भी है
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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मक़्तल-ए-जाँ से कि ज़िंदाँ से कि घर से निकले हम तो ख़ुशबू की तरह निकले जिधर से निकले गर क़यामत ये नहीं है तो क़यामत क्या है शहर जलता रहा और लोग न घर से निकले जाने वो कौन सी मंज़िल थी मोहब्बत की जहाँ मेरे आँसू भी तिरे दीदा-ए-तर से निकले दर-ब-दरी का हमें तअना न दे ऐ चश्म-ए-ग़ज़ाल देख वो ख़्वाब कि जिस के लिए घर से निकले मेरा रहज़न हुआ क्या क्या न पशेमान कि जब इस के ना में मेरे असबाब-ए-सफ़र से निकले बर-सर-ए-दोश रहे या सर-ए-नेज़ा या-रब हक़-परस्ती का न सौदा कभी सर से निकले
Ummeed Fazli
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अक़्ल ने हम को यूँँ भटकाया रह न सके दीवाने भी आबादी को ढूँडने निकले खो बैठे वीराने भी चश्म-ए-साक़ी भी नम है लौ देते हैं पैमाने भी तिश्ना-लबी के सैल-ए-तपाँ से बच न सके मयख़ाने भी संग-ए-जफ़ा को ख़ुश-ख़बरी दो मुज़्दा दो ज़ंजीरों को शहर-ए-ख़िरद में आ पहुँचे हैं हम जैसे दीवाने भी हम ने जब जिस दोस्त को भी आईना दिखाया माज़ी का हैराँ हो कर अक्स ने पूछा आप मुझे पहचाने भी जिस्म की तिश्ना-सामानी से जिस्म ही ना-आसूदा नहीं टूट गए इस ज़द पर आ कर रूह के ताने-बाने भी अंदेशे और बज़्म-ए-जानाँ दार का ज़िक्र और इतना सुकूत दीवानों के भेस में शायद आ पहुँचे फ़रज़ाने भी
Ummeed Fazli
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इक ऐसा मरहला-ए-रह-गुज़र भी आता है कोई फ़सील-ए-अना से उतर भी आता है तिरी तलाश में जाने कहाँ भटक जाऊँ सफ़र में दश्त भी आता है घर भी आता है तलाश साए की लाई जो दश्त से तो खुला अज़ाब-ए-सूरत-ए-दीवार-ओ-दर भी आता है सकूँ तो जब हो कि मैं छाँव सेहन में देखूँ नज़र तो वैसे गली का शजर भी आता है बदन की ख़ाक समेटे हुए हो क्या लोगों सफ़र में लम्हा-ए-तर्क-ए-सफ़र भी आता है दिलों को ज़ख़्म न दो हर्फ़-ए-ना-मुलाएम से ये तीर वो है कि जो लौट कर भी आता है मैं शहर में किसे इल्ज़ाम-ए-ना-शनासी दूँ ये हर्फ़ ख़ुद मिरे किरदार पर भी आता है नज़र ये किस से मिली ना-गहाँ कि याद आया इसी गली में कहीं मेरा घर भी आता है हवा के रुख़ पे नज़र ताइरान-ए-ख़ुश-परवाज़ क़फ़स का साया पस-ए-बाल-ओ-पर भी आता है मैं हर्फ़ हर्फ़ में उतरा हूँ रौशनी की तरह सो काएनात का चेहरा नज़र भी आता है लहू से हर्फ़ तराशें जो मेरी तरह उम्मीद उन्हीं के हिस्से में ज़ख़्म-ए-हुनर भी आता है
Ummeed Fazli
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जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया परछाईं ज़िंदा रह गई इंसान मर गया बर्बादियाँ तो मेरा मुक़द्दर ही थीं मगर चेहरों से दोस्तों के मुलम्मा उतर गया ऐ दोपहर की धूप बता क्या जवाब दूँ दीवार पूछती है कि साया किधर गया इस शहर में फ़राश-तलब है हर एक राह वो ख़ुश-नसीब था जो सलीक़े से मर गया क्या क्या न उस को ज़ोम-ए-मसीहाई था 'उमीद' हम ने दिखाए ज़ख़्म तो चेहरा उतर गया
Ummeed Fazli
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ऐ दिल-ए-ख़ुद-ना-शनास ऐसा भी क्या आईना और इस क़दर अंधा भी क्या उस को देखा भी मगर देखा भी क्या अर्सा-ए-ख़्वाहिश में इक लम्हा भी क्या दर्द का रिश्ता भी है तुझ से बहुत और फिर ये दर्द का रिश्ता भी किया ज़िंदगी ख़ुद लाख ज़हरों का थी ज़हर ज़हर-ए-ग़म तुझ से मिरा होता भी क्या पूछता है राह-रौ से ये सराब तिश्नगी का नाम है दरिया भी क्या खींचती है अक़्ल जब कोई हिसार धूप कहती है कि ये साया भी क्या उफ़ ये लौ देती हुई तन्हाइयाँ शहर में आबाद है सहरा भी क्या ख़ुद उसे दरकार थी मेरी नज़र ख़ुद-नुमा जल्वा मुझे देता भी क्या रक़्स करना हर नए झोंके के साथ बर्ग-ए-आवारा है ये दुनिया भी क्या ख़ंदा-ज़न ग़म पर ख़ुशी पर अश्क-बार इन दिनों यारो है रंग अपना भी क्या बे-तब-ओ-ताब-ए-शुआ-ए-आगही इश्क़ कहिए जिस को वो शो'ला भी क्या गाहे गाहे प्यार की भी इक नज़र हम से रूठे ही रहो ऐसा भी क्या ऐ मिरी तख़्लीक़-ए-फ़न तेरे बग़ैर मैं कि सब कुछ था मगर मैं था भी क्या नग़्मा-ए-जाँ को गिराँ-गोशों के पास ना-रसाई के सिवा मिलता भी क्या
Ummeed Fazli
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