मक़्तल-ए-जाँ से कि ज़िंदाँ से कि घर से निकले हम तो ख़ुशबू की तरह निकले जिधर से निकले गर क़यामत ये नहीं है तो क़यामत क्या है शहर जलता रहा और लोग न घर से निकले जाने वो कौन सी मंज़िल थी मोहब्बत की जहाँ मेरे आँसू भी तिरे दीदा-ए-तर से निकले दर-ब-दरी का हमें तअना न दे ऐ चश्म-ए-ग़ज़ाल देख वो ख़्वाब कि जिस के लिए घर से निकले मेरा रहज़न हुआ क्या क्या न पशेमान कि जब इस के ना में मेरे असबाब-ए-सफ़र से निकले बर-सर-ए-दोश रहे या सर-ए-नेज़ा या-रब हक़-परस्ती का न सौदा कभी सर से निकले
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता तू छोड़ रहा है तो ख़ता इस में तिरी क्या हर शख़्स मिरा साथ निभा भी नहीं सकता प्यासे रहे जाते हैं ज़माने के सवालात किस के लिए ज़िंदा हूँ बता भी नहीं सकता घर ढूँड रहे हैं मिरा रातों के पुजारी मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता
Waseem Barelvi
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दर-पेश हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है कि अचानक सुधर गया हूँ मैं
Jaun Elia
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अक़्ल ने हम को यूँँ भटकाया रह न सके दीवाने भी आबादी को ढूँडने निकले खो बैठे वीराने भी चश्म-ए-साक़ी भी नम है लौ देते हैं पैमाने भी तिश्ना-लबी के सैल-ए-तपाँ से बच न सके मयख़ाने भी संग-ए-जफ़ा को ख़ुश-ख़बरी दो मुज़्दा दो ज़ंजीरों को शहर-ए-ख़िरद में आ पहुँचे हैं हम जैसे दीवाने भी हम ने जब जिस दोस्त को भी आईना दिखाया माज़ी का हैराँ हो कर अक्स ने पूछा आप मुझे पहचाने भी जिस्म की तिश्ना-सामानी से जिस्म ही ना-आसूदा नहीं टूट गए इस ज़द पर आ कर रूह के ताने-बाने भी अंदेशे और बज़्म-ए-जानाँ दार का ज़िक्र और इतना सुकूत दीवानों के भेस में शायद आ पहुँचे फ़रज़ाने भी
Ummeed Fazli
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नाज़ कर नाज़ कि ये नाज़ जुदा है सब से मेरा लहजा मिरी आवाज़ जुदा है सब से जुज़ मोहब्बत किसे मालूम कि वो चश्म-ए-हया बात तो करती है अंदाज़ जुदा है सब से जिस को भी मार दिया ज़िंदा-ए-जावेद किया हर्फ़-ए-हक़ तेरा ये ए'जाज़ जुदा है सब से देखना कौन है क्या उस को नहीं जान-ए-अज़ीज़ सर-ए-दरबार इक आवाज़ जुदा है सब से टूट जाता है तो सुर और भी लौ देते हैं दिल जिसे कहते हैं वो साज़ जुदा है सब से सोच कर दाम बिछाना ज़रा ऐ मौज-ए-हवा मेरे इनकार की परवाज़ जुदा है सब से नश्शा-ए-दहर-ओ-क़यामत का तो क्या ज़िक्र 'उमीद' वो मिरा सर्व-ए-सर-अफ़राज़ जुदा है सब से
Ummeed Fazli
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वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है बिछड़ने वाला शरीक-ए-सफ़र तो अब भी है ज़बाँ बुरीदा सही मैं ख़िज़ाँ-गज़ीदा सही हरा-भरा मिरा ज़ख़्म-ए-हुनर तो अब भी है सुना था हम ने कि मौसम बदल गए हैं मगर ज़मीं से फ़ासला-ए-अब्र-ए-तर तो अब भी है हमारी दर-बदरी पर न जाइए कि हमें शुऊर-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर तो अब भी है हवस के दौर में मम्नून-ए-याद-ए-यार हैं हम कि याद-ए-यार दिलों की सिपर तो अब भी है कहानियाँ हैं अगर मो'तबर तो फिर इक शख़्स कहानियों की तरह मो'तबर तो अब भी है हज़ार खींच ले सूरज हिसार-ए-अब्र मगर किरन किरन पे गिरफ़्त-ए-नज़र तो अब भी है समुंदरों से ज़मीनों को ख़ौफ़ क्या कि उमीद नुमू-पज़ीर ज़मीन-ए-हुनर तो अब भी है मगर ये कौन बदलती हुई रुतों से कहे शजर में साया नहीं है शजर तो अब भी है
Ummeed Fazli
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जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया परछाईं ज़िंदा रह गई इंसान मर गया बर्बादियाँ तो मेरा मुक़द्दर ही थीं मगर चेहरों से दोस्तों के मुलम्मा उतर गया ऐ दोपहर की धूप बता क्या जवाब दूँ दीवार पूछती है कि साया किधर गया इस शहर में फ़राश-तलब है हर एक राह वो ख़ुश-नसीब था जो सलीक़े से मर गया क्या क्या न उस को ज़ोम-ए-मसीहाई था 'उमीद' हम ने दिखाए ज़ख़्म तो चेहरा उतर गया
Ummeed Fazli
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कब तक इस प्यास के सहरा में झुलसते जाएँ अब ये बादल जो उठे हैं तो बरसते जाएँ कौन बतलाए तुम्हें कैसे वो मौसम हैं कि जो मुझ से ही दूर रहें मुझ में ही बस्ते जाएँ हम से आज़ाद-मिज़ाजों पे ये उफ़्ताद है क्या चाहते जाएँ उसे ख़ुद को तरसते जाएँ हाए क्या लोग ये आबाद हुए हैं मुझ में प्यार के लफ़्ज़ लिखें लहजे से डसते जाएँ आइना देखूँ तो इक चेहरे के बे-रंग नुक़ूश एक नादीदा सी ज़ंजीर में कसते जाएँ जुज़ मोहब्बत किसे आया है मुयस्सर 'उम्मीद' ऐसा लम्हा कि जिधर सदियों के रस्ते जाएँ
Ummeed Fazli
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