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कल उस की आँख ने क्या ज़िंदा गुफ़्तुगू की थी गुमान तक न हुआ वो बिछड़ने वाला है

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@ummeed-fazli
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कल उस की आँख ने क्या ज़िंदा गुफ़्तुगू की थी गुमान तक न हुआ वो बिछड़ने वाला है
जाने किस मोड़ पे ले आई हमें तेरी तलब सर पे सूरज भी नहीं राह में साया भी नहीं
चमन में रखते हैं काँटे भी इक मक़ाम ऐ दोस्त फ़क़त गुलों से ही गुलशन की आबरू तो नहीं
आसमानों से फ़रिश्ते जो उतारे जाएँ वो भी इस दौर में सच बोलें तो मारे जाएँ
ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते
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