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जब भी उस शख़्स को देखा जाए कुछ कहा जाए न सोचा जाए दीदा-ए-कोर है क़र्या क़र्या आइना किस को दिखाया जाए दामन-ए-अहद-ए-वफ़ा क्या था मैं दिल ही हाथों से जो निकला जाए दर्द-मंदों से तग़ाफ़ुल कब तक उस को एहसास दिलाया जाए क्या वो इतना ही हसीं लगता है इस को नज़दीक से देखा जाए वो कभी सुर है कभी रंग 'अमजद' उस को किस नाम से ढूँडा जाए

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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न आसमाँ से न दुश्मन के ज़ोर ओ ज़र से हुआ ये मोजज़ा तो मिरे दस्त-ए-बे-हुनर से हुआ क़दम उठा है तो पाँव तले ज़मीं ही नहीं सफ़र का रंज हमें ख़्वाहिश-ए-सफ़र से हुआ मैं भीग भीग गया आरज़ू की बारिश में वो अक्स अक्स में तक़्सीम चश्म-ए-तर से हुआ सियाही शब की न चेहरों पे आ गई हो कहीं सहर का ख़ौफ़ हमें आईनों के डर से हुआ कोई चले तो ज़मीं साथ साथ चलती है ये राज़ हम पे अयाँ गर्द-ए-रहगुज़र से हुआ तिरे बदन की महक ही न थी तो क्या रुकते गुज़र हमारा कई बार यूँँ तो घर से हुआ कहाँ पे सोए थे 'अमजद' कहाँ खुलीं आँखें गुमाँ क़फ़स का हमें अपने बाम-ओ-दर से हुआ

Amjad Islam Amjad

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औरों का था बयान तो मौज सदा रहे ख़ुद उम्र भर असीर-ए-लब-ए-मुद्दआ' रहे मिस्ल-ए-हबाब बहर-ए-ग़म-ए-हादसात में हम ज़ेर-ए-बार-ए-मिन्नत-ए-आब-ओ-हवा रहे हम उस से अपनी बात का माँगे अगर जवाब लहरों का पेच-ओ-ख़म वो खड़ा देखता रहे आया तो अपनी आँख भी अपनी न बन सकी हम सोचते थे उस से कभी सामना रहे गुलशन में थे तो रौनक़-ए-रंग-ए-चमन बने जंगल में हम अमानत-ए-बाद-ए-सबा रहे सुर्ख़ी बने तो ख़ून-ए-शहीदाँ का रंग थे रौशन हुए तो मशअ'ल-ए-राह-ए-बक़ा रहे 'अमजद' दर-ए-निगार पे दस्तक ही दीजिए इस बे-कराँ सुकूत में कुछ ग़लग़ला रहे

Amjad Islam Amjad

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अगरचे कोई भी अंधा नहीं था लिखा दीवार का पढ़ता नहीं था कुछ ऐसी बर्फ़ थी उस की नज़र में गुज़रने के लिए रस्ता नहीं था तुम्हीं ने कौन सी अच्छाई की है चलो माना कि मैं अच्छा नहीं था खुली आँखों से सारी उम्र देखा इक ऐसा ख़्वाब जो अपना नहीं था मैं उस की अंजुमन में था अकेला किसी ने भी मुझे देखा नहीं था सहर के वक़्त कैसे छोड़ जाता तुम्हारी याद थी सपना नहीं था खड़ी थी रात खिड़की के सिरहाने दरीचे में वो चाँद उतरा नहीं था दिलों में गिरने वाले अश्क चुनता कहीं इक जौहरी ऐसा नहीं था कुछ ऐसी धूप थी उन के सरों पर ख़ुदा जैसे ग़रीबों का नहीं था अभी हर्फ़ों में रंग आते कहाँ से अभी मैं ने उसे लिक्खा नहीं था थी पूरी शक्ल उस की याद मुझ को मगर मैं ने उसे देखा नहीं था बरहना ख़्वाब थे सूरज के नीचे किसी उम्मीद का पर्दा नहीं था है 'अमजद' आज तक वो शख़्स दिल में कि जो उस वक़्त भी मेरा नहीं था

Amjad Islam Amjad

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कमाल-ए-हुस्न है हुस्न-ए-कमाल से बाहर अज़ल का रंग है जैसे मिसाल से बाहर तो फिर वो कौन है जो मावरा है हर शय से नहीं है कुछ भी यहाँ गर ख़याल से बाहर ये काएनात सरापा जवाब है जिस का वो इक सवाल है फिर भी सवाल से बाहर है याद अहल-ए-वतन यूँँ कि रेग-ए-साहिल पर गिरी हुई कोई मछली हो जाल से बाहर अजीब सिलसिला-ए-रंग है तमन्ना भी हद-ए-उरूज से आगे ज़वाल है बाहर न उस का अंत है कोई न इस्तिआ'रा है ये दास्तान है हिज्र-ओ-विसाल से बाहर दुआ बुज़ुर्गों की रखती है ज़ख़्म उल्फ़त को किसी इलाज किसी इंदिमाल से बाहर बयाँ हो किस तरह वो कैफ़ियत कि है 'अमजद' मिरी तलब से फ़रावाँ मजाल से बाहर

Amjad Islam Amjad

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रात मैं इस कश्मकश में एक पल सोया नहीं कल मैं जब जाने लगा तो उस ने क्यूँँ रोका नहीं यूँँ अगर सोचूँ तो इक इक नक़्श है सीने पे नक़्श हाए वो चेहरा कि फिर भी आँख में बनता नहीं क्यूँँ उड़ाती फिर रही है दर-ब-दर मुझ को हवा मैं अगर इक शाख़ से टूटा हुआ पत्ता नहीं आज तन्हा हूँ तो कितना अजनबी माहौल है एक भी रस्ते ने तेरे शहर में रोका नहीं हर्फ़ बर्ग-ए-ख़ुश्क बन कर टूटते गिरते रहे ग़ुंचा-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना होंट पर फूटा नहीं दर्द का रस्ता है या है साअ'त-ए-रोज़-ए-हिसाब सैकड़ों लोगों को रोका एक भी ठहरा नहीं शबनमी आँखों के जुगनू काँपते होंटों के फूल एक लम्हा था जो 'अमजद' आज तक गुज़रा नहीं

Amjad Islam Amjad

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