ghazalKuch Alfaaz

जो मंसबों के पुजारी पहन के आते हैं कुलाह तौक़ से भारी पहन के आते हैं अमीर-ए-शहर तिरी तरह क़ीमती पोशाक मिरी गली में भिकारी पहन के आते हैं यही अक़ीक़ थे शाहों के ताज की ज़ीनत जो उँगलियों में मदारी पहन के आते हैं हमारे जिस्म के दाग़ों पे तब्सिरा करने क़मीसें लोग हमारी पहन के आते हैं इबादतों का तहफ़्फ़ुज़ भी उन के ज़िम्में है जो मस्जिदों में सफ़ारी पहन के आते हैं

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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यूँँ सदा देते हुए तेरे ख़याल आते हैं जैसे का'बे की खुली छत पे बिलाल आते हैं रोज़ हम अश्कों से धो आते हैं दीवार-ए-हरम पगड़ियाँ रोज़ फ़रिश्तों की उछाल आते हैं हाथ अभी पीछे बंधे रहते हैं चुप रहते हैं देखना ये है तुझे कितने कमाल आते हैं चाँद सूरज मिरी चौखट पे कई सदियों से रोज़ लिक्खे हुए चेहरे पे सवाल आते हैं बे-हिसी मुर्दा-दिली रक़्स शराबें नग़्में बस इसी राह से क़ौमों पे ज़वाल आते हैं

Rahat Indori

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चेहरों की धूप आँखों की गहराई ले गया आईना सारे शहर की बीनाई ले गया डूबे हुए जहाज़ पे क्या तब्सिरा करें ये हादिसा तो सोच की गहराई ले गया हालाँकि बे-ज़बान था लेकिन अजीब था जो शख़्स मुझ से छीन के गोयाई ले गया मैं आज अपने घर से निकलने न पाऊँगा बस इक क़मीस थी जो मिरा भाई ले गया 'ग़ालिब' तुम्हारे वास्ते अब कुछ नहीं रहा गलियों के सारे संग तो सौदाई ले गया

Rahat Indori

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मेरे अश्कों ने कई आँखों में जल-थल कर दिया एक पागल ने बहुत लोगों को पागल कर दिया अपनी पलकों पर सजा कर मेरे आँसू आप ने रास्ते की धूल को आँखों का काजल कर दिया मैं ने दिल दे कर उसे की थी वफ़ा की इब्तिदा उस ने धोका दे के ये क़िस्सा मुकम्मल कर दिया ये हवाएँ कब निगाहें फेर लें किस को ख़बर शोहरतों का तख़्त जब टूटा तो पैदल कर दिया देवताओं और ख़ुदाओं की लगाई आग ने देखते ही देखते बस्ती को जंगल कर दिया ज़ख़्म की सूरत नज़र आते हैं चेहरों के नुक़ूश हम ने आईनों को तहज़ीबों का मक़्तल कर दिया शहर में चर्चा है आख़िर ऐसी लड़की कौन है जिस ने अच्छे-ख़ासे इक शाइ'र को पागल कर दिया

Rahat Indori

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वो इक इक बात पे रोने लगा था समुंदर आबरू खोने लगा था लगे रहते थे सब दरवाज़े फिर भी मैं आँखें खोल कर सोने लगा था चुराता हूँ अब आँखें आइनों से ख़ुदा का सामना होने लगा था वो अब आईने धोता फिर रहा है उसे चेहरे पे शक होने लगा था मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया मैं सब के सामने रोने लगा था

Rahat Indori

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तुम्हारे नाम पर मैं ने हर आफ़त सर पे रक्खी थी नज़र शो'लों पे रक्खी थी ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी हमारे ख़्वाब तो शहरों की सड़कों पर भटकते थे तुम्हारी याद थी जो रात भर बिस्तर पे रक्खी थी मैं अपना अज़्म ले कर मंज़िलों की सम्त निकला था मशक़्क़त हाथ पे रक्खी थी क़िस्मत घर पे रक्खी थी इन्हीं साँसों के चक्कर ने हमें वो दिन दिखाए थे हमारे पाँव की मिट्टी हमारे सर पे रक्खी थी सहर तक तुम जो आ जाते तो मंज़र देख सकते थे दिए पलकों पे रक्खे थे शिकन बिस्तर पे रक्खी थी

Rahat Indori

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